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छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) के विरोध में आदिवासियों को अनावश्यक रूप से भड़काने हेतु चलाया जा रहा भ्रामक अभियान

रायपुर –  छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (UCC) कुछ निहित स्वार्थी आदिवासी संगठनों द्वारा दुष्प्रचार अभियान का विषय बना दी गई है। राज्य सरकार के अधिकारियों, यहां तक कि उपमुख्यमंत्री द्वारा भी स्पष्ट आश्वासन दिए जाने के बावजूद कि आदिवासी समुदायों को प्रस्तावित UCC के दायरे से बाहर रखा जाएगा, कुछ संगठन यह भ्रामक प्रचार कर रहे हैं कि समान नागरिक संहिता से आदिवासियों की मूल संस्कृति, परंपराओं एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस स्थिति में यह गंभीर प्रश्न उठता है कि जब राज्य सरकार पहले ही आदिवासी समुदायों को प्रस्तावित UCC के दायरे से बाहर रखने की प्रतिबद्धता जता चुकी है, तो आखिर ये संगठन किस बात का विरोध कर रहे हैं? इससे इन संगठनों की वास्तविक मंशा एवं उद्देश्य पर संदेह उत्पन्न होता है कि वे ऐसी प्रस्तावित कानूनी व्यवस्था के विरुद्ध गरीब एवं भोले-भाले आदिवासियों को क्यों गुमराह एवं उकसाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका उन पर कोई प्रभाव पड़ने की बात नहीं कही गई है।
यह भी उल्लेखनीय है कि भाजपा शासित असम, गुजरात एवं उत्तराखंड में, जहां समान नागरिक संहिता पहले ही लागू की जा चुकी है, आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। ऐसे में, जबकि छत्तीसगढ़ में भी भाजपा की सरकार है तथा राज्य के उपमुख्यमंत्री द्वारा आदिवासियों को UCC के दायरे से बाहर रखने का आश्वासन दिया जा चुका है, फिर भी कुछ आदिवासी संगठन अनावश्यक रूप से विरोध एवं भ्रम की स्थिति क्यों उत्पन्न कर रहे हैं? आदिवासी समाज के सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक उत्थान से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, ये संगठन कथित तौर पर एक ऐसे विषय को लेकर भोले-भाले आदिवासियों को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं, जो उनके लिए प्रासंगिक नहीं बताया जा रहा है। इस प्रकार के भ्रामक प्रचार से आदिवासी समुदायों में अनावश्यक चिंता, अविश्वास एवं विरोध की भावना उत्पन्न हो सकती है, जिससे सामाजिक असंतोष एवं तनाव बढ़ने की आशंका है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी सरकारी नीति का विरोध करना पूरी तरह वैध एवं लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जब विरोध का आधार भ्रामक तथ्यों एवं असत्य प्रचार पर आधारित हो, तो उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। आदिवासी अस्मिता की रक्षा एवं उनकी सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण राजनीतिक प्रचार का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके बजाय आदिवासी समुदायों को बेहतर शिक्षा, रोजगार, मूलभूत सुविधाएं एवं जीवन स्तर में सुधार उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों पर प्राथमिकता से ध्यान दिया जाना चाहिए। इसलिए आदिवासी समुदायों की भावनाओं का दुरुपयोग कर उन्हें गुमराह करने वाले भ्रामक प्रचार का तथ्यात्मक रूप से प्रतिवाद करना आवश्यक है। आदिवासी समाज के शिक्षित एवं प्रबुद्ध वर्ग को आगे आकर आदिवासियों को राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस्तेमाल किए जाने से रोकना चाहिए तथा उनका ध्यान शिक्षा, रोजगार, आजीविका एवं अन्य बुनियादी समस्याओं जैसे वास्तविक मुद्दों की ओर केंद्रित करना चाहिए।