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नवीन जिला सक्ती की चतुर्थ वर्षगांठ : विकास के दावों के बीच जनहित का यक्ष प्रश्न

नवीन जिला सक्ती की चतुर्थ वर्षगांठ : विकास के दावों के बीच जनहित का यक्ष प्रश्न kshititech

हमें जो दिखा, वह लिखा… अगर आपने भी दर्द महसूस किया है तो बात और लोगों तक पहुंचाएं, ताकि सक्ती के समग्र विकास के लिए क्रांति का आगाज हो सके : अधिवक्ता चितरंजय पटेल

सक्ती । नवीन जिला सक्ती के स्थापना दिवस पर जिलावासियों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए 9 सितंबर 2022 को नवीन जिले के रूप में सक्ती की स्थापना के बाद आज चतुर्थ वर्षगांठ का अवसर है। यह निश्चित रूप से जिलेवासियों को बधाई देने और उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर होना चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि इन तीन वर्षों में जिले में ऐसी कौन-सी बड़ी उपलब्धि सामने आई है, जिससे आमजन वास्तव में गौरवान्वित होकर उसका उत्सव मना सके?

जिले की चतुर्थ वर्षगांठ पर तथाकथित जागरूक नागरिकों से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वे पिछले तीन वर्षों का आत्ममंथन करें। देखें कि जिलेवासियों के हित में क्या हुआ, सरकारों ने विकास को लेकर क्या घोषणाएं कीं और उनमें से कितनी जमीन पर उतरीं। विभागवार मूल्यांकन कर भविष्य की रणनीति तैयार करना ही स्थापना दिवस को सार्थक बनाने का बेहतर माध्यम हो सकता है।

न्याय के क्षेत्र में अब भी इंतजार

न्याय विभाग की स्थिति जिलेवासियों को सबसे अधिक हतोत्साहित करती है। न्यायालय भवन के निर्माण में अत्यधिक विलंब के कारण सक्ती आज भी पूर्ण सिविल जिला व्यवस्था से वंचित है। जांजगीर की दूरी के कारण जिले के बड़ी संख्या में लोगों के लिए सहज, सरल और सुलभ न्याय की राह आज भी कठिन बनी हुई है। न्यायालय भवन निर्माण में देरी का खामियाजा अंततः आम नागरिक को ही भुगतना पड़ रहा है।

राजस्व व्यवस्था भी अधूरी

राजस्व विभाग की बात करें तो जैजैपुर, हसौद और भोथिया तहसीलों को मिलाकर प्रस्तावित जैजैपुर अनुविभाग अब तक अस्तित्व में नहीं आ सका है। यह स्थिति तब है, जब जैजैपुर में वर्ष 2019 से सिविल कोर्ट संचालित हो रहा है। सवाल यह है कि जब न्यायिक व्यवस्था वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है, तो प्रशासनिक व्यवस्था को पूर्ण स्वरूप देने में आखिर इतनी देर क्यों?

स्वास्थ्य व्यवस्था : रेफर-रेफर का खेल

स्वास्थ्य विभाग की स्थिति तो सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई देती है। जिला बनने के तीन वर्ष बाद भी पूर्ण विकसित जिला अस्पताल जैसी व्यवस्था धरातल पर नजर नहीं आती। जिला अस्पताल स्तर के विशेषज्ञ चिकित्सकों और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को लगातार उच्च चिकित्सा केंद्रों की ओर रेफर किया जाता है।

आम नागरिक का सवाल सीधा है—यदि गंभीर मरीजों को उपचार के लिए दूसरे शहरों की ओर ही जाना है, तो जिला मुख्यालय पर मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था का सपना कब पूरा होगा?

पुलिस व्यवस्था भी संसाधनों की कमी से जूझ रही

पुलिस विभाग में भी प्रत्येक पुलिस अधीक्षक के समक्ष जिला पुलिस बल की कमी, थाना भवनों और पुलिस आवास की आवश्यकता जैसे मुद्दे सामने आते रहे हैं। नंदौरखुर्द में प्रस्तावित पुलिस लाइन की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। तीन वर्षों में वहां वृक्षारोपण के अलावा कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं देना व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

परिवहन विभाग के लिए भी जांजगीर की दौड़

परिवहन विभाग की स्थिति भी जिले के लिए विडंबनापूर्ण है। स्कूल बसों के फिटनेस जैसे कार्यों के लिए भी वाहनों को जांजगीर ले जाना पड़ता है। जिला मुख्यालय सक्ती में परिवहन विभाग का स्थायी अथवा अस्थायी कार्यालय, प्रभारी अधिकारी और पर्याप्त कर्मचारी व्यवस्था दिखाई नहीं देती। आरटीओ से जुड़े छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी जांजगीर जाना जिलेवासियों की मजबूरी बन गया है।

कलेक्ट्रेट : जिला प्रशासन का हृदय, लेकिन व्यवस्था सवालों में

जिला प्रशासन का हृदय कहे जाने वाले कलेक्ट्रेट की व्यवस्थाएं भी किसी से छिपी नहीं हैं। कहीं अधिकारी एक से अधिक विभागों का प्रभार संभालते नजर आते हैं तो कहीं अन्य विभागों से प्रतिनियुक्त कर्मचारियों के सहारे व्यवस्था संचालित होती दिखाई देती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पर्याप्त मानव संसाधन के बिना नए जिले की प्रशासनिक व्यवस्था अपने अपेक्षित स्वरूप को प्राप्त कर सकती है?

विडंबना यह भी है कि वीआईपी प्रवास के दौरान न्यायालयीन कार्य प्रभावित होने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जिला मुख्यालय आने-जाने वाले आम नागरिकों की सुविधा के लिए भी अभी तक पर्याप्त और सहज परिवहन व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी है।

टोल का मुद्दा भी जस का तस

कलेक्ट्रेट और जिला पंचायत के बीच टोल वसूली का मुद्दा भी लंबे समय से चर्चा में है। इसके विस्थापन की दिशा में प्रयास हुए, लेकिन अब तक स्थायी समाधान सामने नहीं आया है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा टोल विस्थापन को लेकर की गई पहल के बावजूद प्रशासनिक इच्छाशक्ति और वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था के अभाव में यह मामला आज भी उलझा हुआ दिखाई देता है।

व्यापार जगत की अनदेखी…

व्यापारियों को अपने व्यवसाय को लेकर जी एस टी विभाग से सतत आवश्यकता होती है तो वहीं औषधि विभाग का कार्यालय भी एक अपरिहार्य जरूरत है पर आज भी इन विभागों के कोई दफ्तर अथवा कर्मचारी जिले में नहीं है जो उनके लिए कष्टदायक है।

नगर विकास : सपनों के बीच संघर्ष

नगर विकास की तस्वीर देखते ही एक अलग पीड़ा सामने आती है। प्रस्तावित नए शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और स्टेडियम के नाम पर विस्थापित व्यापारी अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। वहीं नगर के खिलाड़ी भी बेहतर खेल सुविधाओं के अभाव को लेकर निराश हैं।

स्टेडियम की परिकल्पना के बीच यदि खिलाड़ियों को पर्याप्त मैदान और खेल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं, तो यह सोचने का विषय है कि जिले की खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए ठोस योजना आखिर कब आकार लेगी?

आखिर चार वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?

अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि जिला स्थापना के बाद इन चार वर्षों में नवीन जिला सक्ती में किस विभाग में, कौन-सा ऐसा लैंडमार्क कार्य हुआ है, जिसे जनहित की बड़ी उपलब्धि के रूप में जिलेवासियों के सामने रखा जा सके?

यदि शासन के अधिकारी और जनप्रतिनिधि ऐसी उपलब्धियों की सूची जनता के सामने रख दें, तो शायद वही इस वर्षगांठ की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

अन्यथा जिले की पहचान विकास की ठोस उपलब्धियों के बजाय कलेक्ट्रेट, डीएमएफ के उपयोग, संसाधनों के बंटवारे और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर खींचतान के लिए होती रही, तो यह निश्चित रूप से चिंतन का विषय होगा।

सबसे बड़ा दोषी कौन?

लेकिन इन सबके लिए केवल व्यवस्था या जनप्रतिनिधियों को दोषी ठहराना भी पर्याप्त नहीं है। कहीं न कहीं हम मध्यमवर्गीय नागरिक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। हम सब बहुत कुछ देखते हैं, महसूस करते हैं, चर्चा करते हैं, लेकिन आवाज उठाने से डरते या संकोच करते हैं।

और यही हमारा संकोच धीरे-धीरे हमारी सामूहिक शक्ति को कमजोर करता है

यदि हम अपने अधिकारों और अपने जिले के विकास के सवालों पर समय रहते आवाज नहीं उठाएंगे, तो आने वाले समय में सक्ती किसी दूसरे बड़े शहर पर आश्रित नगर के रूप में पहचान बनाने को मजबूर हो सकता है।

आलोचना नहीं, आत्ममंथन का अवसर

आज स्थापना दिवस के अवसर पर यह आलेख किसी व्यक्ति, दल या व्यवस्था की आलोचना के उद्देश्य से नहीं है। यह उस दर्द का बखान है, जो एक जागरूक नागरिक के रूप में दिखाई देता है और महसूस होता है।

यदि आपको भी इस दर्द का अहसास होता है, तो इस बात को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। सवाल पूछें, तथ्यों पर चर्चा करें और जिले के समग्र विकास के लिए एकजुट होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करें।

क्योंकि यदि हम चुप रहे, तो जो होता आया है, वही आगे भी होता रहेगा। और कहीं ऐसा न हो कि हम अपनी ही बर्बादी पर ताली बजाते रह जाएं।

आइए, सक्ती की चतुर्थ वर्षगांठ को केवल बधाई और शुभकामनाओं का अवसर न बनाकर आत्ममंथन, जनजागरण और समग्र विकास के संकल्प का दिवस बनाएं।