सक्ती

जय मां अष्टभुजी स्व सहायता समूह, ग्राम अकोलजमोरा द्वारा प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य

जैविक उत्पाद निर्माण से आत्मनिर्भर बना महिला समूह, किसानों को भी मिला लाभ

सक्ती – कृषि विभाग द्वारा संचालित “नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना” अंतर्गत जिले के विकासखंड डभरा के ग्राम अकोलजमोरा स्थित बी.आर.सी. महिला स्व सहायता समूह ने प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। सीमित संसाधनों के बावजूद समूह ने कृषि विभाग के आर्थिक सहयोग, प्रशिक्षण, सामूहिक प्रयास एवं नवाचार के माध्यम से उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। प्रारंभ में समूह की महिलाओं को प्राकृतिक उत्पादों के निर्माण एवं उपयोग की सीमित जानकारी थी। इसके पश्चात कृषि विभाग द्वारा उन्हें विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों जैसे बीजामृत, जीवामृत, ब्रह्मास्त्र, नीमास्त्र एवं अन्य जैविक उत्पादों के निर्माण का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद समूह ने इन उत्पादों का बड़े स्तर पर निर्माण प्रारंभ किया। समूह द्वारा लगभग 12,650 लीटर जीवामृत, 1,250 लीटर बीजामृत, 1,250 लीटर नीमास्त्र तथा 1,530 लीटर ब्रह्मास्त्र का उत्पादन किया गया। इनमें से अधिकांश उत्पादों का किसानों के बीच विक्रय एवं उपयोग कराया गया। इन उत्पादों के उपयोग से किसानों को रासायनिक उत्पादों के प्रभावी विकल्प प्राप्त हुए तथा समूह को भी आर्थिक लाभ मिला। उत्पादों की बिक्री के माध्यम से समूह के सदस्यों ने लगभग 26,750 रुपये की आय अर्जित की। इस पहल के अंतर्गत 325 से अधिक किसानों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया गया। किसानों द्वारा जैविक एवं प्राकृतिक उत्पादों के उपयोग से फसलों की गुणवत्ता एवं उत्पादन में सुधार देखा गया है, वहीं खेती की लागत में भी कमी आई है। इस प्रकार यह पहल प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ किसानों की आय और उत्पादन क्षमता में वृद्धि का माध्यम बन रही है। बी.आर.सी. अकोलजमोरा की अध्यक्ष श्रीमती विरिस बाई बघेल ने बताया कि यह पहल केवल महिलाओं के सशक्तिकरण का उदाहरण नहीं है, बल्कि जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। आज यह समूह आसपास के गांवों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है तथा आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उप संचालक कृषि, सक्ती ने बताया कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण एवं सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं भी आर्थिक रूप से सशक्त बन सकती हैं तथा कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।