बुजुर्ग मां-बाप की संपत्ति पर कब्जा नहीं, वरिष्ठों की सुरक्षा के लिए बेटे की हो सकती है बेदखली…सुप्रीम कोर्ट


सक्ती- भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में माता-पिता को भगवान स्वरूप मानते हुए उनके अंतिम सांस तक उनके सुरक्षा सम्मान होता रहा है परंतु मुगलकालीन एवं ब्रिटिश सभ्यता के प्रहार से भारतीय संस्कृति एवं बुरी तरह से आघात हुई है और वर्तमान समय में संतान अपने माता-पिता की संपत्ति पर जबरदस्ती कब्जा करती है या उसे हथियाती है, और उन्हें जवान के अंतिम पलों में दर-दर कि ठोकरें खाने को मजबूर कर देती है तब माता- पिता के पास भारतीय कानूनों के तहत आपराधिक और सिविल कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है जिसके तहत धोखाधड़ी, आपराधिक अतिचार (Trespass)और वरिष्ठ नागरिकों के उत्पीड़न का गंभीर अपराध बनता है।
इस संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग विधि के प्रदेश अध्यक्ष एवं उच्च न्यायालय अधिवक्ता चितरंजय पटेल ने बताया कि यदि संतान जबरन माता-पिता के घर में घुसकर या संपत्ति हथियाते हैं, तो यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) / पुरानी आईपीसी की धाराओं के तहत संपत्ति पर अवैध कब्जा और अतिचार का अपराध बनता है तो वहीं यदि संतान ने बहला-फुसलाकर, धमकी देकर या हस्ताक्षर फर्जी तरीके से कराकर संपत्ति अपने नाम गिफ्ट डीड या वसीयत के जरिए ट्रांसफर करवा ली है, तो यह धोखाधड़ी का अपराध माना जाता है।
उन्होंने आगे बताया कि वरिष्ठ नागरिक एवं माता-पिता के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007(Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens act 2007)
के तहत गठित न्यायाधिकरण (Tribunals) बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा, भरण-पोषण और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर उनके घर से बेटे या बहू को बेदखल करने का आदेश दे सकते हैं तथा बुजुर्ग माता- पिता (60 वर्ष या उससे अधिक आयु) बच्चों द्वारा प्रताड़ित किए जाते हैं या उनकी संपत्ति छीनते हैं, तो वे भरण- पोषण प्राधिकरण में आवेदन कर सकते हैं तब ट्रिब्यूनल को ऐसे बच्चों को माता-पिता के घर से बेदखल करने और कब्जा वापस दिलाने के साथ ही उनके भारण-पोषण दिलाने के व्यापक अधिकार है। इसके अलावा मां-बाप के द्वारा स्थानीय थाने में बच्चों के द्वारा संपत्ति पर जबरन कब्जा करने, मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना और धमकी दिए जाने पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई जा सकती है।
सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 के तहत एसडीएम (SDM) या ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष के समक्ष आवेदन देकर अवैध रूप से हस्तांतरित संपत्ति के नामान्तरण को रद्द कराया जा सकता है और घर खाली करवा पुनः कब्जा प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही संपत्ति का मालिकाना हक वापस पाने और कब्जेधारी संतान को बेदखल करने के लिए सिविल न्यायालय में वाद दायर किया जा सकता है।
इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय ने हालिया निर्णय; रविकान्त गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और कमलाकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर , में पीड़ित वृद्ध माता-पिता के सुरक्षा और संरक्षण को लेकर व्यापक आदेश दिया है। सामाजिक कार्यकर्ता अधिवक्ता चितरंजय ने आगे कहा कि आज भी मां-बाप के सुरक्षा और संरक्षण को लेकर सामाजिक जागरूकता एवं प्रयास ज्यादा जरुरी है क्योंकि कानून का प्रयोग सभ्य समाज के लिए अंतिम अस्त्र होना चाहिए।

