बाल अपराधियों का गढ़ बनता जा रहा है सक्ती

सक्ती- संगीन अपराधों में नाबालिगों की लगातार संलिप्तता भविष्य के लिए खतरनाक संदेश है, क्योंकि जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कलम और किताब होना चाहिए तब उनके हाथ गन- बंदूक, चाकू- कटर आदि घातक हथियारों से लैस हैं। इसलिए वक्त रहते अवयस्क बच्चों के इस चारित्रिक गिरावट पर अगर नियंत्रण नहीं होता है तो सक्ती अंचल गंभीर वारदातों के ग्रास बनता चला जाएगा और अमन चैन की धरती में अकारण रक्त बहेगा। सक्ती पुलिस के अनुसंधान के दरमियान जोंगरा हत्याकांड, सक्ती स्टेशन का कटर कांड, परसदा नाबालिग हत्याकांड आदि सभी में बाल अपराधियों की संलिप्तता समाज में नैतिक पतन की ओर इंगित कर रहा है कि क्षेत्र में मोबाइल का दुष्प्रभाव, सट्टा और नशे के गिरफ्त में बाल मानस अपने इच्छाओं की पूर्ति के लिए चोरी, लूट-पाट के बाद अब बेझिझक कत्ल करने लगे हैं।
इस पर सिर्फ पुलिस पर जवाबदारी सौंप कर समाज अपनी जवाबदारी से बच नहीं सकता क्योंकि इन सबको केवल आपराधिक कृत्य कहना सच्चाई नहीं है बल्कि बदलते परिवेश के साथ अपराध में शामिल बाल अपराधियों के मानस से जुड़ा विषय है जिससे पार पाने के लिए सामाजिक जागरूकता के साथ आम लोगों के प्रयास ज्यादा जरूरी है।
स्पष्ट है कि बच्चों के प्रति मां-बाप का उदासीन रवैया और विद्यालयों में संस्कारित शिक्षा के अभाव के बीच अश्लीलता परोसता मोबाइल, कम उम्र बच्चों को अपनी शौंक और कामेक्षा पूर्ति के लिए घातक कदम उठाने के लिए दुष्प्रेरित कर रहा है।
वक्त की मांग है कि पुलिस प्रशासन अपराधियों को पकड़कर समाज के बीच वाहवाही मात्र के लिए जिस प्रेस वार्ता में छाती चौड़ी करती है उस प्रचार माध्यम का उपयोग बच्चों के साथ समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना और जागरूकता के लिए मन से प्रयास करे तो निश्चित रुप से अपराध नियंत्रण की दिशा में सकारात्मक पहल साबित होगा। आज समाज में अपराधियों में पुलिस के प्रति डर कम होना अच्छा संकेत नहीं है शायद इसका कारण यह हो सकता है कि आज अपराधी सफेद पोश होकर पुलिस अधिकारियों के पदस्थापना और तबादले के अवसरों को भुनाने गुलदस्ते लेकर पहुंचने लगे है और पुलिस भी इस सम्मान से अभिभूत नजर आती है, इसमें कभी कभी अज्ञानता एक बहाना हो सकता है पर पुलिस ही एक ऐसा विभाग है जहां पदस्थापना के साथ ही लोगों की कुंडली उत्तराधिकार में मिल जाता है। फिर जब अपराधी प्रवृति के लोग सक्षम अधिकारियों के साथ मंच में नजर आते है तो अच्छे- अच्छों का पुलिस की निष्पक्षता को लेकर विश्वास कम होना शुरू हो जाता है तो वहीं दूसरी ओर समाज का तथाकथित सभ्य लोग पुलिस से दूरी इतनी बनाकर रखते हैं, और जब जरूरत पड़े तो मजबूरन बगल में बैठने वालों के शरण में जाकर उनके अनुसार समर्पण करना पड़ता है, और फिर पुलिस की बुराई करते हैं कि पुलिस सही लोगों की नहीं सुनती है।
निश्चित रूप से नवीन जिला सक्ती के निर्माण से ही यहां पर सट्टा और नशा को लेकर प्रेस और जनप्रतिनिधि आवाज बुलंद करते रहे हैं तथा पुलिस भी कार्यवाही करती रही है पर लोगों का कहना है मात्र खानापूर्ति से नियंत्रण असंभव है। पर अब पुलिस को जड़ से काम करने की आवश्यकता है क्योंकि सट्टा और नशा के साथ साइड इफेक्ट के रूप में मार-पीट ब्लात्कार और हत्याओं का दौर चालू हो गया है।
इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग (विधि) के प्रदेश अध्यक्ष एवं उच्च न्यायालय अधिवक्ता चितरंजय पटेल ने कहा कि यद्यपि अभी जिला पुलिस की टीम से लोगों निराश नहीं हैं क्योंकि अपराधों का त्वरित पर्दाफाश पुलिस की सक्रियता को साबित करती है पर आग लगे और कुँआ खोदें… यह नेगेटिव नरेशन है बल्कि अपराध ही घटित न हो, इस पॉजिटिव नैरेटिव के साथ पुलिस काम करे तो निश्चित रूप से अपने अमन चैन के लिए नामचीन सक्ती में शांति व्यवस्था बनी रहेगी।




