वर्ल्ड सोशल मीडिया डे

आलेख/ चितरंजय पटेल अधिवक्ता – हर चीज की स्थान, समय व परिस्थिति के अनुसार आवश्यकता व महत्व होती है। वर्तमान समय में जब पूरा विश्व इंटरनेट आधारित मोबाइल व सोशल मीडिया के गिरफ्त में है तब इस तंत्र का हमारे बीच सकारात्मक परिणाम के बजाय हम पतन की ओर अग्रसर होते दिखाई दे रहे हैं। सर्वप्रथम मोबाइल के साथ ही हर व्यक्ति में झूठ बोलने का साहस व आदत अनायास ही पैदा हो गया है जो किसी भी रूप में समाज के किसी तबके के लिए निरापद नही है । अब सोसल मीडिया ने जो जीवन की हकीकत से परे अफवाहों व सपनों वातावरण बनाया है उससे शायद शेख चिल्ली को भी शर्म आ जाये पर हम है कि सत्य से परे कुछ भी हांक रहे है व पोस्ट कर रहे हैं जिन ने कभी किसी एक व्यक्ति के भी आंसू नहीं पोंछे वे बेशर्मी व दुःसाहस के साथ विकास व परिवर्तन की लंबी बातें फेंक रहे हैं । क्या इन हवा हवाई बातों से उत्थान की कल्पना की जा सकती है, क्या समाज में इन सबको असल में अमल में ला सकते हैं, शायद इन हसीन सपनों का कोई वजूद ही नहीं है, हम सपने दिखाने के बजाय स्वयं देखें, और उसे हकीक़त में परिवर्तित करने पुरुषार्थ करें बजाय सोसल मीडिया पर सस्ती लोकप्रियता के लिए आडम्बर करें, याद रखें हमारे पूर्वजों ने कुछ भी काम किया है तो भोंपू बजाने के बजाय धरातल पर घड़ी बजाकर पसीने बहाए हैं तभी हम आज अपनी पहचान बना सके हैं, ध्यान रहे भोंपू बजाकर सिर्फ शोर करने से हम कुछ तमाशबीनों की भीड़ इकट्ठा तो कर सकते हैं पर वह भीड़ छंटते देर नहीं लगती, कहा गया है कि दान, योगदान की चर्चा स्वयं के मुंह से न कभी अच्छा लगा है और न ही लगेगा, बल्कि तारीफ दूसरों के लबों से ही जायज लगती है इसलिए मुंह मियां मिट्ठू बनने के बजाय योगदान के बखान दूसरों पर छोड़ दें ।अपने अन्तरात्मा की सोंच से सत्य को आत्मसात करें और उसे प्रगट करने का साहस भी रखें तभी सही इज्जत व सुकून की जिंदगी पा सकेंगे, क्योंकि छल कपट से सफल तो हो सकते हैं पर सम्मान नहीं पा सकते।




