सक्ती में माँ महामाया मंदिर का भंडारा बना मजाक

दान के पैसों से बेच रहे है माँ महामाई का प्रसाद एवं जोत में जल रही है नकली घी एवं तेल
सक्ती- सक्ती आस्था का प्रतीक सक्ती की ऐतिहासिक माँ महामाया मंदिर में हर नवरात्रि पर्व पर रात के वक्त लगने वाला भोग प्रसाद (भंडारा) कुछ कथित लोगो की बफौती बन गई है यही वजह है कि दान के रुपयों से लगने वाले भंडारा प्रसाद को बेच कर कुछ लोग अपनी तिजोरी भरने में लगे हुए है।
दरअसल रविवार को सक्ती के महामाया मंदिर में मोतीलाल देवांगन (राधिका फैसन) द्वारा 13 हजार की राशि देकर भंडारा लगवाया गया था लेकिन मंदिर प्रबंधन द्वारा दान के पैसे से बने भंडारा प्रसाद को टोकन के माध्यम में बेच दिया गया। एक तरफ जहा श्रद्धालु माँ के भोग पाने के लिए घंटो तक लंबी कतार में लगे रहे तो दूसरी तरफ टोकन कटा कर भंडारा प्रशाद पाने वालों की भी लंबी कतार लगी रही। दुःखद पहलू यह है कि ना तो ठीक तरह से टोकन कटाने वालो को भंडारा प्रसाद मिल पाया और ना कतार में लगे लोगो को।
रविवार को आयोजित इस भंडारा प्रसाद वितरण में घोर अब्यवस्था रही और इसकी पूरी जिम्मेदारी माँ महामाया प्रबंधन को जाती है जिसने एक लकवाग्रस्त नौकर के कंधे पर मंदिर की पूरी ब्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी सौप दी थी। छत्तीसगढ़ में चंद्रपुर, रतनपुर, अड़भार , डोंगरगढ़ और जगदलपुर में भी आदिशक्ति माँ महामाया का मंदिर है लेकिन वंहा से इस तरह की खबर इसलिए निकाल कर नही आती है क्योंकि वंहा ट्रस्ट बना हुआ है जो हर काम को पूरी जिम्मेदारी के साथ करती है।
सक्ती के महामाया मंदिर में लोगों के आस्था एवं मनोकामना से खिलवाड़ किया जा रहा है मंदिर में नवरात्र पर्व पर ज्योत जलाने में नकली घी एवं तेल उपयोग किया जा रहा है एवं घी और तेल की राशि अच्छे तेलों की वसूली की जा रही है यह लोगों की धार्मिक आस्था का खिलवाड़ है आज पर्यंत कभी भी कमेटी के द्वारा कोई भी हिसाब सार्वजनिक नहीं किया गया है जो नगर में चर्चा का विषय बना हुआ है।
लेकिन सक्ती के महामाया मन्दिर में सामाजिक ना तो कोई ट्रस्ट है और ना कोई समिति जो इस मंदिर की जिम्मेदारी उठाती हो। यही वजह है कि यह मंदिर किसी एक व्यक्ति की बन कर रह गई है और वह जो चाहे वो करते रहता है। ऐसे में जरूरत है कि छत्तीसगढ़ के अन्य मंदिरों की तरह सक्ती के माँ महामाया मंदिर को भी ट्रस्ट बनाया जाय जिसका अध्यक्ष कलेक्टर रहे और हर नवरात्रि में कुल संपत्ति का ऑडिट हो जिससे मंदिर की संपत्ति किसी के बफौती ना बनी रहे।


