सक्ती की जनता आसमान की ओर लगाए बैठी है अपनी निगाहें- बारिश के इंतजार में व्याकुल हो गए हैं लोग

गर्मी एवं उमस की मार से असहाय हो गया है सक्ती वासियों का जीवन. दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा जल संकट
सक्ती – देश में भले ही मानसून ने अपनी दस्तक दे दी है। किंतु सक्ती शहर सहित आसपास के क्षेत्र में देखा जाए तो मानसून की एक बूंद भी लोगों को नसीब नहीं हो रही है। तथा जिला मुख्यालय में गर्मी की तपिश एवं उमस ने लोगों को व्याकुल कर दिया है। तथा लोगों की निगाहें सुबह उठते ही आसमान की तरफ रहती है। कि आज पानी गिरेगा कि नहीं गिरेगा तथा लोग दिन भर मोबाइल में मौसम विभाग की साइट पर जाकर आकलन करते नजर आते हैं। कि आज शहर का मौसम क्या है। किंतु ऐसा लगता है कि इस बार पानी की इस बेरुखी को देखते हुए कहीं आकाल की स्थिति निर्मित ना हो जाए एवं इस पानी की बेरुखी ने जहां किसानों की भी चिंता बढ़ा दी है तो वहीं यदि एक आद सप्ताह और पानी नहीं गिरा तो लोगों का जीवन और अधिक व्याकुल हो जाएगा। आज मार्च- अप्रैल महीने में गर्मी की जितनी व्याकुलता देखने को नहीं मिल रही थी उससे ज्यादा व्याकुलता जून महीने के अंतिम सप्ताह में देखने को मिल रही है। जबकि इस समय पिछले वर्षों का आकलन किया जाए तो झमाझम बारिश से लोग तर बदर रहते थे
हमारी लापरवाही से ही प्रतिवर्ष बन रही मौसम की अनिश्चितता की स्थिति
आज पर्यावरण के प्रति कहीं ना कहीं हमारी गैर जिम्मेदाराना हरकत ने समय पर होने वाली मानसून को भी हमसे दूर कर दिया है। किंतु इसके बावजूद मनुष्य की समझ में नहीं आता. अंधाधुध पेड़ों की कटाई एवं जल संरक्षण के प्रति हमारी उदासीनता कहीं न कहीं हमारे जीवन को ही नुकसान पहुंचा रही है। समय रहते यदि मनुष्य इसे समझ जाएगा तो अच्छा है नहीं समझेगा तो उसी का ही नुकसान होना है. आज शासन भी वृक्षारोपण को लेकर लगातार लोगों को जागरुक कर रहा है। किंतु वृक्षारोपण का काम आज केवल फोटोग्राफी तक सीमित रह गया है। लोग पेड़ लगाते समय सेल्फी एवं फोटो खिंचवाकर उसे वायरल करते हैं। किंतु बाद में उन्हीं पेड़ों को संरक्षण देने की बजाय वे पेड़ समय पूर्व ही समाप्त हो जाते हैं। किंतु इसकी चिंता मनुष्य को नहीं है
सरकारों के वृक्षारोपण के लक्ष्य से 10% भी यदि काम होता तो आज नहीं रहती यह स्थिति
प्रतिवर्ष केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा कागजों में निर्धारित वृक्षारोपण के लक्ष्य की तुलना में यदि 10% वृक्ष भी ईमानदारी के साथ लगाए जाते. तो आज देश में जल संरक्षण को लेकर यह स्थिति नहीं होती तथा हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित रहता एवं हम जल संरक्षण के प्रति भी अपना योगदान दे पाते. किंतु आज स्थिति बदल चुकी है. वृक्षारोपण करने के लिए ऐसी- ऐसी जगह का चयन किया जाता है। जहां पेड़ लगाने के बाद मवेशी उसे खा जाते हैं। किंतु शासन को वृक्षारोपण के बाद उसे सुरक्षा देने की दिशा में लोहे की जाली बनाकर देने का प्रावधान करना चाहिए। किंतु हमारी सरकारे भी सुर्खियां बटोरने में लगी हुई है। एवं कैसे कागजों पर अधिक से अधिक लोगों तक वह वाही लूट सके। बस यही काम चल रहा है।




