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ऑनलाइन दवा खरीदते हैं तो सावधान! फैला नकली दवा सिंडिकेट, ‘ऑपरेशन फेक पिल’ की 24 घंटे में दूसरी कार्रवाई

STF ने नकली दवा रैकेट पर कार्रवाई की. कोटद्वार में अवैध दवा फैक्ट्री सील. ‘ऑपरेशन फेक पिल’ ने खोली माफियाओं की परतें.

ऑनलाइन दवा खरीदते हैं तो सावधान! फैला नकली दवा सिंडिकेट, 'ऑपरेशन फेक पिल' की 24 घंटे में दूसरी कार्रवाई kshititech
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ऑनलाइन दवा खरीदते हैं तो सावधान! फैला नकली दवा सिंडिकेट, 'ऑपरेशन फेक पिल' की 24 घंटे में दूसरी कार्रवाई kshititech

देहरादून – अगर आप भी ऑनलाइन दवा खरीद रहे हैं, तो सावधान हो जाएं. हो सकता है वो दवा नकली हो और आपको नुकसान पहुंचा सकती है. देवभूमि उत्तराखंड में लोगों के साथ खिलवाड़ करने वाले नकली दवा माफियाओं पर लगातार एसटीएफ अपना शिकंजा कस कस रही है.
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए ब्रांडेड कंपनियों के नाम पर नकली जीवनरक्षक दवाइयों का धंधा करने वाले गिरोह का खुलासा होने के बाद अब जांच एजेंसियां एक-एक कड़ी जोड़ते हुए पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने में जुट गई है. 24 घंटे के भीतर हुई दूसरी बड़ी कार्रवाई में कोटद्वार स्थित एक अवैध दवा फैक्ट्री को सील कर दिया गया. इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि नकली दवाओं का यह कारोबार बेहद संगठित तकनीकी रूप से चालाक और कई राज्यों में फैला हुआ था.
कोटद्वार की बंद फैक्ट्री में चल रहा था मौत का कारोबार: एसटीएफ को इनपुट मिला था कि कोटद्वार के सिडकुल सिगड्डी क्षेत्र में स्थित एक बंद पड़ी फैक्ट्री के भीतर गुपचुप तरीके से दवाओं का निर्माण किया जा रहा है. सूचना के सत्यापन के बाद एसटीएफ, ड्रग विभाग और प्रशासन की संयुक्त टीम ने मैसर्स नैक्टर हर्ब्स एंड ड्रग्स परिसर में छापेमारी की. जांच में सामने आया कि फैक्ट्री का लाइसेंस वर्ष 2024 मं  ही निरस्त किया जा चुका था. बावजूद इसके परिसर के भीतर मशीन, टैबलेट निर्माण उपकरण और संदिग्ध सामग्री मौजूद थी. अधिकारियों ने मौके से लगदोभग तीन किलो कंप्रेस्ड टैबलेट और 34 पंच उपकरण बरामद किए, जिनका इस्तेमाल दवा निर्माण में किया जाता है.
फैक्ट्री का विवादों से भरा इतिहास: जिस फैक्ट्री पर एसटीएफ ने कार्रवाई की, उसका नाम पहले भी गंभीर आरोपों में सामने आ चुका है. कोरोना महामारी के दौरान वर्ष 2021 में इसी यूनिट पर नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाने के आरोप लगे थे. उस दौर में जब लोग अपनों की जान बचाने के लिए अस्पतालों के बाहर संघर्ष कर रहे थे, तब कुछ लोग बीमारी को कारोबार में बदल रहे थे. यही नहीं, वर्ष 2024 में तेलंगाना पुलिस ने भी इसी फैक्ट्री पर छापा मारकर नकली दवाइयों और फर्जी पैकेजिंग सामग्री का बड़ा जखीरा बरामद किया था. इसके बावजूद, अवैध गतिविधियां पूरी तरह बंद नहीं हुईं और नेटवर्क लगातार सक्रिय बना रहा.
फेसबुक पेज से चल रहा था नकली दवाओं का ऑनलाइन बाजार: पूरे मामले की शुरुआत एसके हेल्थ केयर नाम के एक फेसबुक पेज से हुई. जहां नामी कंपनियों की दवाइयां बाजार मूल्य से आधे दाम में बेची जा रही थीं. एसटीएफ को जब इस ऑनलाइन नेटवर्क पर शक हुआ तो टीम ने खुद ग्राहक बनकर दवाइयां मंगाईं. जांच में सामने आया कि जो दवाइयां लोगों तक पहुंचाई जा रही थीं, वे असली नहीं बल्कि बेहद शातिर तरीके से तैयार की गई नकली दवाइयां थीं. पैकेजिंग इतनी सटीक बनाई गई थी कि सामान्य ग्राहक ही नहीं कई मेडिकल कारोबारी भी धोखा खा रहे थे.
ब्रांडेड कंपनियों की हूबहू कॉपी कर बनाया गया फर्जी नेटवर्क: जांच में सामने आया कि गिरोह सनफार्मा, जायडस, ग्लेनमार्क, मैनकाइंड, मैक्लोड्स और अन्य प्रतिष्ठित कंपनियों की दवाओं की नकल तैयार कर रहा था. नकली टैबलेट तैयार करने के बाद उन पर असली जैसी पैकिंग, होलोग्राम और फर्जी एमआरपी चस्पा कर बाजार में उतारा जाता था. गिरोह का नेटवर्क बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़ और उत्तराखंड तक फैला हुआ था. ऑनलाइन ऑर्डर मिलने के बाद दवाइयों को कोरियर के जरिए अलग-अलग राज्यों में भेजा जाता था.
गिरफ्तार आरोपियों ने उगले कई सनसनीखेज राज: एसटीएफ की गिरफ्त में आए आरोपियों में गौरव त्यागी और जतिन सैनी शामिल है. पूछताछ में गौरव त्यागी ने खुलासा किया कि रुड़की में उसकी फैक्ट्री पहले भी पकड़ी जा चुकी थी. लेकिन इसके बावजूद उसने अलग-अलग स्थानों से फिर नकली दवा निर्माण शुरू कर दिया. उसने कबूल किया कि जरूरत पड़ने पर बंद पड़ी फैक्ट्रियों को अस्थायी रूप से खोला जाता था और उत्पादन के बाद फिर उन्हें बंद कर दिया जाता था, ताकि किसी को शक न हो. जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य चेहरों की तलाश में जुटी है.
गंदगी के बीच तैयार हो रही थीं जीवनरक्षक दवाइयां: मामले से जुड़ी शुरुआती जांच और स्थानीय रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि, जिन जगहों पर दवाइयां तैयार की जा रही थीं, वहां न तो मेडिकल सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा था और न ही कर्मचारियों के पास कोई तकनीकी प्रशिक्षण था. कई कर्मचारी बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के दवा निर्माण में लगे हुए थे. ऐसी परिस्थितियों में तैयार दवाइयां मरीजों के लिए बेहद घातक साबित हो सकती हैं. नकली दवाओं का सेवन बीमारी को बढ़ाने के साथ-साथ मरीज की जान भी जोखिम में डाल सकता है.
मुनाफे के लालच में मरीजों की जिंदगी से सौदा: एसटीएफ एसएसपी अजय सिंह की मानें तो इस कारोबार में कुछ दवा विक्रेताओं की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है. कम कीमत में दवाइयां खरीदकर उन्हें प्रिंटेड एमआरपी पर बेचने का खेल लंबे समय से चल रहा था. मोटे मुनाफे के लालच में कई लोग बिना सत्यापन इन दवाओं को बाजार में उतार रहे थे. यही कारण है कि नकली दवाओं का यह नेटवर्क धीरे-धीरे कई राज्यों में फैलता चला गया. एसटीएफ ने इस मामले को केवल दवा तस्करी नहीं बल्कि संगठित आपराधिक नेटवर्क माना है. साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन देहरादून में आरोपियों के खिलाफ संगठित अपराध धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तैयार करने, आईटी एक्ट और कॉपीराइट एक्ट समेत कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है. जांच एजेंसियां अब आर्थिक लेनदेन सप्लाई चैन और ऑनलाइन नेटवर्क की गहराई से पड़ताल कर रही है.
जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बना नकली दवा सिंडिकेट: एसटीएफ एसएसपी अजय सिंह की मानें तो,
नकली दवाइयां केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि साइलेंट किलर की तरह काम करती हैं. कई बार मरीज को पता तक नहीं चलता कि वह असली दवा की जगह नकली दवा का सेवन कर रहा है. इससे बीमारी बढ़ जाती है और शरीर में दवा प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाता है, जिससे इलाज पूरी तरह विफल हो सकता है. खासकर हार्ट, कैंसर और संक्रमण से जुड़ी दवाओं में इस तरह की मिलावट बेहद खतरनाक मानी जाती है. हम इन दवाइयों के बारे में लगातार एक्सपर्ट से भी जानकारी ले रहे हैं और ये जानने की कोशिश कर रहे हैं कि ये कितनी खतरनाक हो सकती है. -अजय सिंह, एसएसपी एसटीएफ-
लालच में न खरीदें सस्ती दवाइयां: एसटीएफ ने आम जनता से अपील की है कि, हमेशा अधिकृत मेडिकल स्टोर से ही दवाइयां खरीदें और बिना बिल दवा लेने से बचें. यदि कोई दवा असामान्य रूप से सस्ते दाम में मिल रही हो तो उसकी सत्यता जरूर जांचें. दवा का बैच नंबर, एक्सपायरी डेट और पैकेजिंग ध्यान से देखें. किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस या ड्रग विभाग को दें.
अब बड़े चेहरों तक पहुंचने की तैयारी में जांच एजेंसियां: अजय सिंह की मानें तो ‘ऑपरेशन फेक पिल’ की शुरुआती कार्रवाई ने यह संकेत दे दिया है कि उत्तराखंड में नकली दवाओं का नेटवर्क केवल छोटे स्तर तक सीमित नहीं था. जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस कारोबार में कई राज्यों के कारोबारी सप्लायर और ऑनलाइन नेटवर्क जुड़े हो सकते हैं. फिलहाल एसटीएफ लगातार छापेमारी और पूछताछ में जुटी हुई है. आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।