सक्ती

व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण ‍- तेजस्विनी बालिका छात्रावास

बिलासपुर – ‌राष्ट्र निर्माण की आधारशिला व्यक्ति के निर्माण में निहित है। जब व्यक्ति का चिंतन उदात्त, चरित्र दृढ़ और आचरण कर्तव्यनिष्ठ होता है, तब उसके व्यक्तित्व का प्रभाव परिवार पर पड़ता है। संस्कारित परिवार समाज को दिशा देता है और जागरूक, संगठित तथा संवेदनशील समाज समर्थ राष्ट्र का निर्माण करता है। इस प्रकार व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक पहुँचने वाली यह यात्रा परस्पर जुड़ी हुई कड़ियों की श्रृंखला है। राष्ट्र सेविका समिति का कार्य इसी प्रक्रिया को साकार करने की साधना है, जिसमें नारी की अंतर्निहित शक्ति को जागृत कर उसे समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए प्रेरित किया जाता है।

इस साधना का आरंभ शाखा से होता है। शाखा में होने वाले शारीरिक अभ्यास, खेल, गीत, बौद्धिक चर्चा और सामूहिक गतिविधियाँ सेविका में अनुशासन, आत्मविश्वास, समयपालन, सहकार और नेतृत्व के गुण विकसित करती हैं। नियमित अभ्यास से उसमें संकोच पर विजय पाने, अपने विचार स्पष्टता से व्यक्त करने और दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करने की क्षमता आती है। प्रशिक्षण के माध्यम से वह योजना बनाना, साथियों के साथ समन्वय स्थापित करना और कठिन परिस्थितियों में धैर्यपूर्वक निर्णय लेना सीखती है। इस प्रकार शाखा में विकसित गुण उसके दैनिक जीवन का अंग बनते हैं। वह अपने परिवार में अधिक उत्तरदायी, अपने कार्यक्षेत्र में अधिक दक्ष और समाज के प्रति अधिक संवेदनशील बनती है।

यहीं से व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया व्यापक रूप ग्रहण करती है। सेविका जब अपने व्यवहार में सत्यनिष्ठा, अनुशासन, श्रम के प्रति सम्मान और सेवा की भावना को स्थान देती है, तब उसका प्रभाव परिवार के अन्य सदस्यों पर भी पड़ता है। बच्चे उसके उपदेशों से ही नहीं, बल्कि उसके आचरण से सीखते हैं। घर में यदि दूसरों के प्रति सम्मान, कर्तव्यपालन और जरूरतमंदों की सहायता सहज जीवनचर्या का हिस्सा बन जाए, तो वही संस्कार अगली पीढ़ी के व्यक्तित्व में उतरते हैं। इस प्रकार संस्कारित व्यक्ति संस्कारित परिवार का आधार बनता है और परिवार समाज के लिए सद्गुणों की पहली पाठशाला सिद्ध होता है।इसी कार्य में राष्ट्र सेविका समिति विगत 90 वर्षों से निरंतर कार्यरत है।

जब यही संस्कार परिवार की सीमाओं से बाहर निकलकर सामाजिक व्यवहार में प्रकट होते हैं, तब समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया आरंभ होती है। सेविका अपनी व्यक्तिगत क्षमता को सामूहिक कार्य से जोड़ती है। वह बालिकाओं की शिक्षा, महिलाओं के सशक्तीकरण, सामाजिक समरसता और जरूरतमंदों की सहायता के लिए लोगों को संगठित करती है। किसी बस्ती में बालिकाओं की पढ़ाई बाधित हो रही हो, तो परिवारों से संवाद करके और उपलब्ध सहयोग जुटाकर उनकी शिक्षा जारी रखने का प्रयास किया जा सकता है। जब कुछ लोग इस कार्य में सहभागी बनते हैं, तो एक छोटी-सी पहल सामूहिक उत्तरदायित्व में बदलने लगती है। यही वह बिंदु है, जहाँ व्यक्ति का संस्कार समाज की शक्ति बन जाता है।

इस प्रक्रिया का एक प्रेरक और ठोस उदाहरण बिलासपुर का राष्ट्र सेविका समिति द्वारा संचालित तेजस्विनी बालिका छात्रावास है, जहाँ कुष्ठरोग से प्रभावित माता-पिता की स्वस्थ बालिकाओं के लिए शिक्षा, आवास और पालन-पोषण की व्यवस्था की जाती है। छात्रावास की संचालिका माननीय सुलभा ताई जी के मार्गदर्शन में इन बालिकाओं को सुरक्षित वातावरण, शिक्षा और स्नेहपूर्ण देखभाल के साथ आत्मनिर्भर भविष्य की दिशा प्रदान की जाती है। उनका प्रयास केवल बालिकाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके भीतर आत्मविश्वास, संस्कार और स्वावलंबन की भावना विकसित करना भी है।

इस कार्य का महत्त्व केवल बालिकाओं को आश्रय उपलब्ध कराने में नहीं, बल्कि उनके जीवन की संभावनाओं को विस्तृत करने में है। जिस बालिका के सामने परिस्थितियों के कारण शिक्षा अधूरी रह जाने का संकट हो सकता था, उसे जब अध्ययन, संस्कार और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, तब उसमें आत्मविश्वास जागता है। वह अपनी परिस्थितियों को ही अपनी नियति मानने के स्थान पर अपने परिश्रम और योग्यता से जीवन सँवारने का संकल्प कर सकती है। शिक्षा उसे आत्मनिर्भर बनाती है, संस्कार उसे सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध कराते हैं और आत्मविश्वास उसे अपने पैरों पर खड़े होने की शक्ति देता है। आगे चलकर वही बालिका अपने परिवार का सहारा बन सकती है और समाज में अन्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी। इस प्रकार एक बालिका का जीवन सँवारने का प्रयास भावी परिवार और समाज के निर्माण में योगदान देता है।

व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का यह संबंध आपदा के समय भी स्पष्ट दिखाई देता है। भूकंप, बाढ़, तूफान अथवा अन्य संकटों में जब जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है, तब प्रशिक्षित और अनुशासित कार्यकर्ताओं की तत्परता, संवेदनशीलता तथा संगठन क्षमता अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। प्रकाशित विवरणों में लातूर और गुजरात के भूकंप, ओडिशा के तूफान तथा उत्तराखंड की आपदा के दौरान सेविकाओं के राहत एवं सेवा कार्यों का उल्लेख मिलता है। सुनामी से प्रभावित अनाथ बालिकाओं के लिए आश्रय और शिक्षा की व्यवस्था की गई है।

आपदा के समय भोजन, वस्त्र और आवश्यक सामग्री पहुँचाना तत्काल सहायता है; किंतु पीड़ितों के मन में विश्वास जगाना, बच्चों की शिक्षा की चिंता करना और प्रभावित परिवारों को पुनः अपने पैरों पर खड़ा होने में सहयोग देना सेवा का व्यापक स्वरूप है। जब सेविका संकटग्रस्त व्यक्ति के दुःख को अपना दायित्व मानकर आगे आती है, तब उसके भीतर विकसित संवेदना कर्म में परिणत होती है। अनेक सेविकाएँ समन्वय के साथ कार्य करती हैं, तो व्यक्तिगत प्रयास सामूहिक शक्ति बन जाते हैं। यही संगठन की सार्थकता है—व्यक्ति की क्षमता को समाज की आवश्यकता से जोड़ देना।

इस प्रकार शाखा में विकसित अनुशासन, प्रशिक्षण से प्राप्त कार्यकुशलता और सेवा से पुष्ट संवेदनशीलता मिलकर ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं, जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी जीना जानता है। ऐसा व्यक्ति अपने परिवार को संस्कारित करता है; संस्कारित परिवार समाज में सहयोग, सद्भाव और उत्तरदायित्व की भावना बढ़ाता है; और जागरूक तथा संगठित समाज राष्ट्र की शक्ति को सुदृढ़ करता है।

अंततः राष्ट्र निर्माण किसी दूरस्थ लक्ष्य की प्राप्ति नहीं, बल्कि हमारे दैनिक आचरण में निहित साधना है। जब व्यक्ति अपने भीतर श्रेष्ठ गुणों का विकास करता है, परिवार में संस्कारों का संचार करता है और समाज के दुःख-दर्द में सहभागी बनता है, तब राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया वास्तविक रूप ग्रहण करती है। यही इस कार्य का व्यापक आशय है—व्यक्ति की सुप्त शक्तियों को जागृत करना, उन शक्तियों को सेवा से जोड़ना और सेवा के माध्यम से समाज को समर्थ बनाना।

व्यक्ति में संस्कार, परिवार में संस्कृति, समाज में समरसता और राष्ट्र में सामर्थ्य—यही व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की सार्थक यात्रा है।