नवरात्रि सप्तमी विशेष: दुष्टों का संहार करने वाली माँ कालरात्रि की पूजा आज

सक्ती- शारदीय नवरात्रि के सप्तमी तिथि के पावन अवसर पर आज देश भर में माता दुर्गा के सातवें स्वरूप, माँ कालरात्रि की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। माँ कालरात्रि अपने भक्तों को अभय प्रदान करने वाली और शत्रुओं का नाश करने वाली देवी हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में रक्तबीज नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। उसे वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से रक्त की एक भी बूंद यदि धरती पर गिरेगी, तो हुबहू वैसा ही दूसरा राक्षस पैदा हो जाएगा। युद्ध के मैदान में जब उसके रक्त से लाखों राक्षस उत्पन्न होने लगे, तब माँ दुर्गा के क्रोध से अत्यंत भयानक स्वरूप वाली माँ कालरात्रि प्रकट हुईं। उन्होंने रक्तबीज का वध किया और उसके खून को धरती पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया। इसके बाद उन्होंने चंड-मुंड और शुंभ-निशुंभ जैसे महादानवों का भी संहार कर देवताओं व सृष्टि की रक्षा की।
माँ कालरात्रि का स्वरूप अंधकार की तरह काला है। उनके बाल बिखरे हुए हैं और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। देवी गधे (गदहा) की सवारी करती हैं। भयानक स्वरूप होने के बावजूद माँ का दाहिना हाथ हमेशा भक्तों को अभय और शुभता का वरदान देता है, यही कारण है कि इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि माता का बीज मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:’ का जाप करने से भूत, प्रेत, अकाल मृत्यु और शत्रुओं का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। माँ कालरात्रि के आराधना दिवस पर अधिवक्ता चितरंजय सिंह पटेल ने देशवासियों को बधाई दी। इस अवसर पर उन्होंने वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि “वर्तमान कलिकाल में जिस तरह रक्तबीज का आतंक था, ठीक उसी तरह आज देश में भारतीय धर्म, संस्कृति एवं अध्यात्म विरोधी वामपंथी सोच दम तोड़ रही है। लेकिन दुखद यह है कि CJP जैसे तिलचट्टे और काकरोच अचानक पैदा हो गए हैं, जो हमारी सनातन संस्कृति को नुकसान पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। इन देश-विरोधी तत्वों का समूल नाश होना अब बेहद जरूरी हो गया है।”
अधिवक्ता पटेल ने माँ कालरात्रि से प्रार्थना करते हुए कहा कि माता भारतीय संस्कृति एवं महान परंपराओं की रक्षा के लिए इन विघटनकारी ‘काकरोचों’ और उनके आकाओं का सर्वनाश सुनिश्चित करें, ताकि देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अक्षुण्ण बना रहे।
