सक्ती

करोड़ों खर्च करने के बाद भी गौठानें खाली,सड़कें बनीं गौशाला:सड़कों पर गौ वंशों के जमावड़े से राहगीर आए दिन हो रहे हैं हादसे के शिकार

हादसों के बीच गौसेवा को लेकर सरकार के दावों और जमीनी हकीकत पर उठे सवाल..?

सक्ती – नगर सहित पूरे प्रदेश में सड़कों पर खुलेआम विचरण करते गौवंशों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कहीं गौवंश सड़कों के बीच बैठे नजर आते हैं तो कहीं कचरे के ढेर में भोजन तलाशते हुए। मुख्य मार्गों,बाजारों और रिहायशी इलाकों में गौवंशों की मौजूदगी न केवल उनके जीवन के लिए खतरा बन रही है,बल्कि आए दिन सड़क दुर्घटनाओं का कारण भी बन रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस गौवंश को सनातन और हिंदू मान्यताओं में विशेष एवं पूजनीय स्थान प्राप्त है,उसकी ऐसी स्थिति आखिर क्यों बनी हुई है? मान्यता है कि गौवंश में तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का वास होता है और भारतीय परंपरा में गाय को ‘माता’ का दर्जा दिया गया है। इसके बावजूद प्रदेश की सड़कों पर जिस तरह गौवंश बेसहारा नजर आ रहे हैं,उसने सरकारी गौ संरक्षण व्यवस्था,गौठानों की उपयोगिता और गौसेवा से जुड़े दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वही सरकार द्वारा गौ वंश को संरक्षित रखने के लिए बाकायदा गौ सेवा आयोग का गठन किया गया है लेकिन आयोग के पदाधिकारी गौ सेवा छोड़ सिर्फ वीआईपी सुविधाओं का लाभ लेने में मशगूल हैं और जिस गौ वंश के चलते उन्हें यह पद प्राप्त हुआ है उसकी बदहाली को नजरअंदाज कर अपनी जवाबदेही से बच रहे हैं जिसका ही परिणाम है कि गौ वंश सड़कों पर विचरण करने मजबूर है
बजट में प्रावधान,फिर जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा असर?
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने 24 फरवरी 2026 को राज्य का बजट प्रस्तुत किया था। आधिकारिक वित्त विभाग के बजट दस्तावेजों के अनुसार यह राज्य का 2026-27 का मुख्य बजट है। वहीं,उपलब्ध जानकारी एवं विभिन्न स्रोतों के अनुसार गौवंश के संरक्षण एवं उत्थान से जुड़ी मदों में करोड़ों रुपये के प्रावधान की बात सामने आई है। हालांकि इस राशि की मदवार स्वीकृति,वास्तविक जारी राशि,विभागवार वितरण तथा खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से सामने आना जरूरी है,ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बजट में प्रावधानित राशि में से कितनी राशि वास्तव में गौवंश संरक्षण पर खर्च हुई और उसका जमीनी प्रभाव क्या रहा। सवाल यह भी है कि यदि करोड़ों रुपये गौ संरक्षण एवं संबंधित व्यवस्थाओं के लिए उपलब्ध कराए जा रहे हैं,तो फिर मुंगेली सहित प्रदेश के अनेक शहरों की सड़कों पर गौवंशों की संख्या कम क्यों नहीं हो रही है? क्या बजट की राशि गौशालाओं,चारा,उपचार,आश्रय एवं संरक्षण की व्यवस्था तक पहुंच रही है? यदि पहुंच रही है तो फिर सड़कों पर बेसहारा गौवंश क्यों दिखाई दे रहे हैं?
‘गौठान’ की अवधारणा और सड़कों की हकीकत में कितना अंतर?
सरकारें गौ संरक्षण और पशुधन संवर्धन को लेकर लगातार योजनाओं और बजटीय प्रावधानों की बात करती रही हैं। इसके बावजूद स्थिति यह है कि कई स्थानों पर सड़कें ही अस्थायी गौठान का रूप लेती दिखाई देती हैं। मुंगेली शहर में भी सभी मुख्य मार्गों और विभिन्न वार्डों में आवारा एवं बेसहारा गौवंशों की मौजूदगी आम लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। रात के समय सड़क पर बैठे गौवंश वाहन चालकों को दिखाई नहीं देने के कारण दुर्घटनाओं की आशंका और बढ़ जाती है। इस स्थिति में नुकसान केवल गौवंश का नहीं होता। कई बार वाहन चालक भी गंभीर रूप से घायल होते हैं और सड़क दुर्घटनाओं में लोगों की जान तक चली जाती है। इसलिए यह केवल धार्मिक या भावनात्मक मुद्दा नहीं,बल्कि सड़क सुरक्षा,पशु कल्याण और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर सार्वजनिक मुद्दा भी है।
विनय चोपड़ा बोले:गौवंश को राजनीति का विषय बनाकर किया इस्तेमाल लेकिन उनकी दुर्दशा पर अब जवाब कौन देगा?
कांग्रेस नेता एवं नगर पालिका परिषद के पार्षद विनय चोपड़ा ने गौवंशों की स्थिति को लेकर प्रदेश सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके अनुसार सरकार ने  गौवंश को राजनीतिक मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया,लेकिन जमीनी स्तर पर गौवंशों की स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।उनके दुर्दशा पर जवाब देने से अब वही लोग बचते नजर आ रहे हैं विनय चोपड़ा का कहना है कि यदि सरकार गौसेवा और गौसंरक्षण को लेकर गंभीर है तो उसे यह बताना चाहिए कि अब तक गौवंशों के लिए क्या ठोस व्यवस्था की गई है और बजट में किए गए प्रावधानों का वास्तविक लाभ कितने गौवंशों तक पहुंचा है। उन्होंने सवाल किया कि “क्या यही विष्णु का सुशासन है?”
संजय यादव ने पूछा:गौवंश की स्थिति सुधरी या फिर यह भी जुमला?
कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष संजय यादव ने भी गौवंशों की स्थिति को लेकर सरकार से सवाल किया। उनका कहना है कि जो लोग गौवंश और गौसेवा के नाम पर राजनीति करते हैं,उनसे जनता का सीधा सवाल है कि क्या प्रदेश में गौवंशों की स्थिति वास्तव में सुधरी है? उनके मुताबिक यदि सुधार हुआ है तो उसका असर सड़कों पर क्यों नहीं दिखाई देता? और यदि स्थिति पहले जैसी ही है तो फिर गौसेवा के नाम पर किए जा रहे दावों का मूल्यांकन कौन करेगा? यादव का कहना है कि जनता सवाल पूछेगी और जिम्मेदार लोगों को उन सवालों का जवाब देना पड़ेगा।
जिला महामंत्री ठाकुर का आरोप:सड़कों पर गौवंश,जिम्मेदार पदों पर वीआईपी सुविधाएं
कांग्रेस कमेटी के जिला महामंत्री ठाकुर ने भी प्रदेश सरकार को घेरते हुए कहा कि सत्ता में आने से पहले गौसेवा और गौसंरक्षण को लेकर बड़े-बड़े वादे किए गए थे,लेकिन आज भी गौवंश सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने गौसेवा आयोग से जुड़े पदाधिकारियों और सदस्यों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि गौसेवा का उद्देश्य वास्तव में गौवंशों का संरक्षण है तो फिर जमीन पर इसका परिणाम दिखाई देना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि “गौवंश सड़कों पर और जिम्मेदार लोग सुविधाओं में—क्या यही गौसेवा है?”
जिला महामंत्री ठाकुर का आरोप:सड़कों पर गौवंश,जिम्मेदार पदों पर वीआईपी सुविधाएं
कांग्रेस कमेटी के जिला महामंत्री ठाकुर ने भी प्रदेश सरकार को घेरते हुए कहा कि सत्ता में आने से पहले गौसेवा और गौसंरक्षण को लेकर बड़े-बड़े वादे किए गए थे,लेकिन आज भी गौवंश सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने गौसेवा आयोग से जुड़े पदाधिकारियों और सदस्यों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि गौसेवा का उद्देश्य वास्तव में गौवंशों का संरक्षण है तो फिर जमीन पर इसका परिणाम दिखाई देना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि “गौवंश सड़कों पर और जिम्मेदार लोग सुविधाओं में—क्या यही गौसेवा है?”
समाजसेवी रविराज सिंह ठाकुर ने पूछा:सरकार कोई भी हो,गौमाता की हालत क्यों नहीं बदली?
नगर के समाजसेवी एवं करनी सेना के नगर प्रभारी रविराज सिंह ठाकुर का कहना है कि सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो,आज तक गौसंरक्षण को लेकर किए गए कार्यों का वास्तविक मूल्यांकन होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकारों और संस्थाओं ने वास्तव में गौसंरक्षण के क्षेत्र में प्रभावी काम किया है तो फिर गौवंशों की स्थिति में अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं दिखाई दे रहा?

उनके अनुसार गौसेवा केवल किसी दुर्घटना या गौवंश की मृत्यु के बाद मौके पर पहुंचकर संवेदना व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए,बल्कि गौवंश के जीवित रहते उसके भोजन,उपचार,आश्रय और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी होगी।
सबसे बड़ा सवाल:गौ पालकों की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
गौवंशों की दुर्दशा के लिए केवल सरकार या गौसेवा समितियों को जिम्मेदार ठहराने से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। इसके लिए उन गौपालकों की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी जो गाय का दूध निकालने के बाद बछड़े,बैल जैसे गौवंश को खुले में छोड़ देते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने गौवंश पाला है तो उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी उसी व्यक्ति की होनी चाहिए। दूध देने की अवधि समाप्त होने के बाद पशु को सड़क पर छोड़ देना न केवल पशु के प्रति अन्याय है बल्कि इससे दूसरे लोगों की जान भी खतरे में पड़ती है। ऐसे मामलों में प्रशासन को यह भी देखना होगा कि क्या स्थानीय स्तर पर पशु पहचान,मालिकों की जिम्मेदारी और छोड़े गए गौवंश की पुनः पकड़ एवं आश्रय की प्रभावी व्यवस्था मौजूद है या नहीं।
दुर्घटनाओं का बढ़ता खतरा,आखिर कब बनेगी स्थायी व्यवस्था?
सड़कों पर बैठे गौवंशों के कारण वाहन चालकों को अचानक ब्रेक लगाना पड़ता है। कई बार पीछे से आने वाले वाहन दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। रात के समय स्थिति और गंभीर हो जाती है। एक तरफ गौवंश दुर्घटनाओं में घायल और मृत हो रहे हैं,दूसरी तरफ आम नागरिक भी इन दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में गौसंरक्षण को केवल धार्मिक भावना से जोड़ने के बजाय इसे प्रशासनिक जिम्मेदारी और सड़क सुरक्षा के मुद्दे के रूप में भी देखने की आवश्यकता है।
सरकार से जनता के सीधे सवाल
मुंगेली सहित प्रदेश की जनता कई सवाल कर रहे हैं—
1. 2026-27 में गौवंश संरक्षण से संबंधित कितनी राशि वास्तव में स्वीकृत और जारी हुई?
2. राशि किन विभागों,संस्थाओं और योजनाओं को दी गई?
3. अब तक कितनी राशि खर्च हो चुकी है?
4. प्रदेश में कितने गौठान/गौशालाएं वर्तमान में संचालित हैं?
5. इनमें कितने गौवंशों को रखने की क्षमता है और वास्तव में कितने गौवंश रखे जा रहे हैं?
6. सड़कों पर घूम रहे गौवंशों को सुरक्षित आश्रय तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किस विभाग की है?
7. दूध निकालने के बाद गौवंशों को सड़क पर छोड़ने वाले पशुपालकों पर क्या कार्रवाई की जा रही है?
8. गौसेवा आयोग और संबंधित संस्थाओं द्वारा पिछले वित्तीय वर्ष में किए गए कार्यों का सार्वजनिक ऑडिट या रिपोर्ट कहां उपलब्ध है?
9. गौवंशों की सुरक्षा के लिए खर्च किए गए सरकारी धन का जमीनी परिणाम क्या है?
अब जरूरत सिर्फ बयान की नहीं,जवाबदेही की है
गौवंशों की समस्या को केवल राजनीति के चश्मे से देखने के बजाय सरकार, प्रशासन, गौसेवा समितियों, पशुपालकों और आम नागरिक—सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी। सरकार यदि करोड़ों रुपये का प्रावधान करती है तो उस राशि का मदवार हिसाब और जमीनी परिणाम जनता के सामने आना चाहिए। गौसेवा समितियां यदि सेवा का दावा करती हैं तो उनकी गतिविधियों और परिणामों का भी मूल्यांकन होना चाहिए। पशुपालकों को भी अपने पशुओं को सड़क पर छोड़ने की प्रवृत्ति रोकनी होगी।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि “गौसेवा के नाम पर कितना पैसा खर्च हुआ?”
सबसे बड़ा सवाल यह है कि “उस पैसे से कितनी गौमाताओं की जिंदगी बदली?”
जब तक इस सवाल का ठोस और आंकड़ों के साथ जवाब सामने नहीं आता,तब तक सड़कों पर घूमता हर बेसहारा गौवंश सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच खड़े एक बड़े सवाल की तरह दिखाई देता रहेगा।