राष्ट्रीय स्वयं संघ के राष्ट्र प्रथम भाव से प्रभावित ममता का पराभव

आलेख / चितरंजय पटेल – बंगाल की शेरनी कही जानी वाली ममता का जीवन काफी उतार चढ़ाव व संघर्षपूर्ण रहा है…बचपन में ही ममता के सर से पिता का साया छीन गया, बीमार मां की सेवा और छोटे भाई-बहनों का पालन पोषण के साथ ही अपना होश संभाला, फिर एक दिन वही युवती भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की हाथ थाम राजनीति की राह चल पड़ी, तब बंगाल में कम्युनिस्ट के खिलाफत आसान काम नहीं था फिर भी राजीव गांधी की छवि से प्रभावित ममता ने खुलकर कम्युनिस्ट का खिलाफत किया, परिणाम स्वरूप कम्युनिस्टों के प्राण घातक हमलों की शिकार ममता कई दिनों तक मौत से जूझती रही और अंततः पुनर्जीवित हो उठी ममता बनर्जी! दुगुनी ताकत से कम्युनिस्टों को ललकारने लगी थी,लेकिन वही साहसी युवती राजीव गांधी की हत्या से इतनी टूटी कि कई दिनों कमरे में बंद होकर रोती रही पर बंगाल शेरनी अंतरात्मा से कम्युनिस्टों को बंगाल से उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ फिर राजनीति में पूरी ताकत से कूद गई थी। पर, इस बार राजीव गांधी के अवसान के बाद कांग्रेसियों के छल शिकार होने से पहले ही उसने क़रीब 29 साल पहले 1997 में कांग्रेस तोड़ कर मुकुल राॅय के साथ मिल कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई तो उसने CPM CPI और कांग्रेस को खत्म करने के लिए भाजपा की पश्चिम बंगाल में इंट्री कराई तो वही मुकुल रॉय बाद में भारतीय जनता पार्टी में चले गए। तब, 1999 में ममता बनर्जी भी भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार में शामिल हो गईं और रेल मंत्री बन गईं।
इसी बीच 2001 की शुरुआत में जब आपरेशन वेस्ट एंड के ज़रिए रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी का बड़ा मामला उजागर हुआ तो ममता एनडीए की सरकार से अलग हो गईं। इस दरमियान
अगस्त 2001 में बीबीसी के एक इंटरव्यू में जब ममता से पूछा गया कि क्या उन की पार्टी के एनडीए में लौटने की कोई संभावना है तो उन्होंने जवाब दिया हां, टीएमसी के घोषणापत्र के मुताबिक भाजपा हमारी ‘स्वाभाविक सहयोगी’ है, और 2003 में ममता फिर एनडीए की सरकार में शामिल हो गई, और लंबे समय तक बिना विभाग की मंत्री रहीं।
2003 में ममता ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के तत्कालीन संपादक तरुण विजय की कम्युनिस्ट आतंकवाद पर लिखी गई पुस्तक के विमोचन समारोह में शिरकत की। तरुण विजय ने ‘बंगाल की दुर्गा’ कह कर उन का स्वागत किया तो वहीं
भाजपा के राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज ने सदन में बोलते हुए ममता के लिए कहा कि ‘हमारी प्यारी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं।’
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी ममता को ‘बंगाल की दुर्गा’ बताया और वामपंथियों के ख़िलाफ़ उन की लड़ाई के पक्ष में ‘ठोस समर्थन’ जताया। ममता ने अपने एक भाषण में संघ के मोहन भागवत, शेषाद्रि चारी और मदन दास देवी का ज़िक्र करते हुए कहा कि ‘मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बहुत ज़्यादा नेताओं को तो नहीं जानती हूं, मगर उन में से कुछ से व्यक्तिगत तौर पर मिली हूं। आप लोग सच्चे देशभक्त हैं। मुझे मालूम है कि आप अपने देश से सच्चा प्यार करते हैं।’
2012 में आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता बनर्जी की सादगीपूर्ण जीवनशैली की तारीफ़ करते हुए लेख में कहा कि ‘ममता उन बिरले राजनीतिकों में हैं, जिन्होंने राजनीति का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए नहीं किया, काश! कि देश को ऐसे ज़्यादा-से-ज़्यादा राजनीतिज्ञ मिलें।’
2019 में ममता ने एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ बहुत-से आंदोलन किए। मगर जब सीएए पर संसद में मतदान हुआ तो उनके तृणमूल के आठ सांसद रहस्यमयी तरीके से ग़ैरहाज़िर रहे, और इस वज़ह से विधेयक पारित हो गया तथा ममता ने इन सांसदों को माफ़ी बख़्श दी और उनके खि़लाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की।
अब 2017 में भाजपा में चले गए मुकुल रॉय 2021 के विधानसभा चुनावों के पहले तृणमूल में वापस आ गए और ममता ने उन्हें खुशी-खुशी शामिल कर लिया, तब चुनावों के दौरान मुकुल ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि बीजेपी इज इक्वल टु टीएमसी।
जुलाई 2022 में तृणमूल ने उपराष्ट्रपति के चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का साथ देने से इनकार कर दिया। बाद में टीएमसी के सांसदों ने मतदान में हिस्सा न लेकर एब्सटेन किया और जगदीप धनखड़ जीत गए। ममता ने उन धनखड़ की भी मदद की, जिनसे बंगाल का राज्यपाल रहते हुए ममता सी ठानी रही।
सितंबर 2022 में ममता ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की दिल खोल कर प्रशंसा की और कहा कि संघ में बहुत-से बड़े अच्छे लोग हैं तथा संघ अच्छा संगठन है। पर आज ममता की तख्ता पलट भी उसी संघ के दम पर संभव हुआ है क्योंकि कहीं न कहीं बंगाल की दीदी राष्ट्र के लिए खतरा बनती नजर आ रही थी।
और इस तरह ममता ने कम्युनिस्टों के खिलाफ कांग्रेस के साथ हुई, पर वही कांग्रेस उसे रास नहीं आई और तृणमूल बनाई अर्थात कम्युनिस्ट और कांग्रेस दोनों विरोधी हुए, तब भाजपा@ एन डी ए के निकट आई और धनकड़ का साथ दिया तो वहीं धनकड़ से नहीं बनी।
परन्तु इस बार अपनी जिद पर अड़ी ममता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के समर्थन में खड़ी ममता ने राष्ट्र विरोधी की बू नजर आने लगी। फिर, वही ममता दीदी राष्ट्र प्रथम भाव से प्रेरित संघ का कोप भजन का शिकार होकर रह गई पर जिन्होंने संघ का विरोध करना तय किया हुआ है अब भी कहते फिर रहे है कि BJD, BSP, JDU, TRS, YSR, PDP के बाद TMC को वही अजगर खा गया। जबकि अब भी आखिरी सत्य है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने प्रारंभ से ही राष्ट्र प्रथम का शपथ लिया है और राष्ट्र हित के साथ कोई समझौता नहीं करना तय किया है और राष्ट्रीय महायज्ञ में अपनों का बलिदान के लिए भी हमेशा तत्पर है, फिर ममता बनर्जी की क्या बिसात है… भारत देश मेरा है और देश के लिए मेरा सर्वस्व न्यौछावर है, भारत माता तेरा वैभव सदा अमर रहे…वंदे मातरम्…भारत माता की जय।


