सक्ती

शिवरीनारायण के आनंदम धाम में शरद पूर्णिमा एवं दशहरा मिलन महोत्सव का भव्य आयोजन

संत रितेश्वर महाराज के भजनों और ओजस्वी विचारों से भावविभोर हुए हजारों श्रद्धालु, कहा- ‘शिवरीनारायण के बेर से मिटेगा दुनिया का बैर’

शिवरीनारायण के आनंदम धाम में शरद पूर्णिमा एवं दशहरा मिलन महोत्सव का भव्य आयोजन kshititech

सक्ती-  शिवरीनारायण नगर के प्रतिष्ठित आनंदम धाम में शरद पूर्णिमा तथा दशहरा मिलन कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। इस आध्यात्मिक महोत्सव में आसपास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, प्रख्यात सतगुरु रितेश्वर महाराज ने भक्त जनों को संबोधित करते हुए सनातन धर्म की महिमा और जीवन के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला।
शबरी के बेर से मिटेगा बैर:
महोत्सव की शुरुआत संत रितेश्वर  महाराज द्वारा गाए गए एक अत्यंत प्रेरक भजन से हुई। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को रेखांकित किया। संत जी ने कहा, “जिस पावन बेर से माता शबरी ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का सत्कार और स्वागत किया था, शिवरीनारायण के उसी पावन बेर से एक दिन पूरी दुनिया का आपसी बैर (दुश्मनी) हमेशा के लिए मिट जाएगा।”
शरद पूर्णिमा: आंतरिक कलुषताओं से जागरण की रात:
शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व बताते हुए रितेश्वर जी ने कहा कि यह सनातन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र उत्सवों में से एक है। यह रात्रि जागरण की रात है, जहां मनुष्य को नींद से नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे मोह, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, भय, द्वेष और तमाम तरह की कलुषताओं व बुराइयों से जागना है।
रासलीला और गोपेश्वर महादेव का रहस्य:
रासलीला के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष को समझाते हुए उन्होंने कहा कि यह राधा-कृष्ण के प्रेम की अद्भुत और अलौकिक लीला है, जो पूरी तरह से सांसारिक मादकता और काम से मुक्त है। जो व्यक्ति राम नाम में अपना मन लगा लेता है, वह काम वासना से स्वतः ही मुक्त हो जाता है। उन्होंने एक रोचक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि राम अवतार के समय के तपस्वी ऋषि ही कृष्ण अवतार के समय प्रभु का सानिध्य पाने के लिए गोपियाँ बने थे। यहाँ तक कि स्वयं देवाधिदेव महादेव भी इस अलौकिक प्रेम से आकर्षित होकर गोपी रूप में वृंदावन पहुंचे थे। वृंदावन में स्थित ‘गोपेश्वर महादेव’ मंदिर इसका साक्षात प्रमाण है, जहाँ शिव जी बाघम्बर और त्रिशूल धारण नहीं करते, बल्कि गोपी रूप में पूजे जाते हैं।
ज्ञान, विज्ञान और जीवन का संतुलन:
संत जी ने चन्द्रमा और सूर्य के उदाहरण से जीवन में संतुलन का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हमारा ज्ञान और आधुनिक विज्ञान दोनों यह मानते हैं कि चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता, वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है। लेकिन दोनों की तासीर (प्रकृति) बिल्कुल अलग है। सूर्य ताप (गर्मी) देता है, जबकि चन्द्रमा ताप को हरकर शीतलता प्रदान करता है। मनुष्य को भी अपने जीवन में इन दोनों तत्वों यानी तेज और शीतलता के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए।
मधुर भजनों के साथ खीर का वितरण:
कार्यक्रम के समापन सत्र में संत रितेश्वर जी महाराज ने राधा रानी के सुमधुर भजनों का गायन किया, जिससे पूरा पंडाल भक्तिमय माहौल में झूम उठा। कार्यक्रम के अंत में शरद पूर्णिमा के पारंपरिक प्रसाद के रूप में सभी उपस्थित श्रोताओं और श्रद्धालुओं को अमृतमयी खीर का वितरण किया गया।
प्रमुख जनों एवं ग्रामीणों की गरिमामयी उपस्थिति:
इस भव्य धार्मिक आयोजन के अवसर पर क्षेत्र के प्रमुख नागरिक संजय अग्रवाल, नगर पंचायत अध्यक्ष राहुल थवाईत, राकेश दुबे, अनिल टाह, विष्णु हरि गुप्ता, संतराम आदित्य, सुनील मिश्रा, सुधीर मिश्रा, धर्मेंद्र राम, देवेंद्र अग्रवाल, विनय कैवर्त, शंकर कैवर्त, सतीश सोनी, संतोष सोनी, अरुण प्रभुवा, दिलीप केशरवानी और किशुन साहू विशेष रूप से उपस्थित रहे। इसके साथ ही दुरपा, तुस्मा, मुड़पार, कनस्दा, सिंघुल, केरा, देवरी, गिधौरी और तेंदुवा सहित दर्जनों गांवों के ग्रामीण व हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस आध्यात्मिक समागम के साक्षी बने।