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सादगी और ईमानदारी के शिखर पुरुष: पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की प्रासंगिकता

सक्ती / बिलासपुर – भारतीय इतिहास में 2 अक्टूबर का दिन दो महान विभूतियों—महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के रूप में दर्ज है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह साफ नजर आता है कि सत्ताधीशों द्वारा जिस तरह महात्मा गांधी को महिमामंडित किया जाता है, वैसा शिष्टाचार कदाचित लाल बहादुर शास्त्री के प्रति दिखाई नहीं देता। यह पक्षपात स्वतंत्र भारत के सियासतदानों के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।
यदि शास्त्री जी के जीवन पर नजर डालें, तो आजाद भारत के अन्य नेताओं की भांति उनमें दिखावा या कथनी-करनी में फर्क बिल्कुल नहीं था। उनका संपूर्ण जीवन सच्चाई, सादगी, अटूट ईमानदारी और अदम्य साहस का एक अनूठा उदाहरण रहा है।

बचपन के संघर्षों से मिली ईमानदारी की सीख
शास्त्री जी का प्रारंभिक जीवन भारी आर्थिक तंगी में बीता। बचपन में नाव का किराया न होने के कारण वे प्रतिदिन अपने कपड़े और बस्ता सिर पर रखकर गंगा नदी तैरकर पार करते और स्कूल जाते थे।

उनके लड़कपन की एक घटना बेहद प्रेरणादायक है;
एक बार फूल तोड़ने पर माली ने उन्हें डांटते हुए कहा था, “पिता विहीन बच्चे को और अधिक ईमानदार और सतर्क रहना चाहिए।” माली के इन शब्दों ने उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला और उनके जीवन में ईमानदारी की मजबूत नींव रख दी।

पद से बड़ा माना नैतिक दायित्व
देश के रेल मंत्री रहते हुए वर्ष 1956 में तमिलनाडु के अरियालुर में एक भीषण रेल दुर्घटना हुई थी। शास्त्री जी ने इस हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने साबित किया कि उनके लिए सत्ता और पद से बढ़कर जनता की जान की सुरक्षा और अपनी जवाबदेही थी—ऐसी मिसाल आधुनिक भारतीय राजनीति में मिलना असंभव है।

फटे कुर्ते और सादगी की अनूठी मिसाल
देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद उनकी सादगी अडिग रही। एक बार उनके फटे कुर्ते को देखकर जब किसी ने टोक दिया, तो शास्त्री जी ने सहजता से जवाब दिया, “मैं एक गरीब का बेटा हूँ और मेरे देश के अधिकांश लोग भी गरीब हैं, इसलिए यही पहनावा मेरे लिये सबसे सहज है।” इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री रहते हुए जब भी उनके परिवार द्वारा सरकारी वाहन का निजी कार्यों में उपयोग किया गया, शास्त्री जी ने किलोमीटर का बाकायदा हिसाब रखकर उसकी पूरी रकम अपनी जेब से सरकारी खजाने में जमा करवाई।

चरण परिक्रमा की राजनीति और आज का संकट
शास्त्री जी के इन प्रेरक प्रसंगों को याद करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग (विधि) के प्रदेश अध्यक्ष एवं उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता चितरंजय पटेल ने वर्तमान राजनीतिक शुचिता पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

“आज दलगत राजनीति और हाईकमान की संस्कृति के कारण राजनीति से संस्कार और शुचिता समाप्तप्राय हो चुके हैं। सिर्फ पद और पैसे की चाह में हर दल के नेता अपने शीर्ष नेतृत्व की चरण परिक्रमा में व्यस्त हैं। इसके कारण लोकतंत्र का मूल मंत्र—जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन—पूरी तरह भटक गया है। जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि ही आज शासन-प्रशासन के माध्यम से जनता के शोषण में लगे हुए हैं।”
— चितरंजय पटेल (अधिवक्ता, उच्च न्यायालय)

वैचारिक धरातल पर शास्त्री जी का स्मरण ही सच्ची श्रद्धांजलि
अधिवक्ता चितरंजय पटेल ने कहा कि आज की विषम परिस्थितियों में हम यह उम्मीद तो नहीं कर सकते कि हमारा कोई भी आधुनिक नेता पूरी तरह शास्त्री जी जैसा बन पाए, लेकिन उनके आदर्शों को स्मरण कर उसे धरातल पर कुछ हद तक उतारने का प्रयास अवश्य किया जा सकता है। वर्तमान दौर में उनके जीवन चरित्र को अपने आचरण में ढालना ही पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के प्रति देश की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।