मल्दा में श्रद्धा भक्ति और आस्था के साथ महिलाओं ने रखी खमरछठ

विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर मांगी संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु
सक्ती / बिर्रा- जनपद पंचायत जैजैपुर के अंतर्गत गौरव ग्राम पंचायत मल्दा के बजरंग चौक में धनाराम कश्यप के निवास पर महिलाओं ने श्रद्धा भक्ति और आस्था के साथ कमरछठ व्रत मनाया। संतान की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना को लेकर महिलाओं ने दिनभर व्रत रखा तथा विधि-विधान से हरछठ माता एवं भगवान बलराम की पूजा-अर्चना की। व्यास आचार्य ओंकार वैष्णव ने उपस्थित सभी महिलाओं को कथा का रसपान रसपान कराया । इस दौरान महिलाओं ने पारंपरिक रूप से पूजन सामग्री अर्पित कर कथा का श्रवण किया और परिवार की सुख-शांति की कामना की। आचार्य महाराज ओंकार वैष्णव ने कहा कि हलषष्ठी व्रत भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। बलराम जी का प्रमुख अस्त्र हल होने के कारण इस पर्व को हलषष्ठी भी कहा जाता है। माताएं अपनी संतान की रक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं।
हलषष्ठी व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। वह गर्भवती थी और एक दिन उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। उसी समय उसे पता चला कि पास के गांव में किसी महिला के घर छठी का कार्यक्रम है। ग्वालिन के पास समय कम था, इसलिए उसने अपने दूध और दही बेचने का सामान वहीं रख दिया और प्रसव के लिए चली गई। कथा के अनुसार उस दिन हलषष्ठी का पर्व था। ग्वालिन ने व्रत के नियमों का पालन नहीं किया था और प्रसव के बाद भी उसने लोगों को दूध-दही बेचने का कार्य जारी रखा। कुछ समय बाद उसके नवजात शिशु पर संकट आ गया। ग्वालिन को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने हरछठ माता से क्षमा याचना मांगी। कहा जाता है कि उसने श्रद्धापूर्वक हरछठ माता की पूजा-अर्चना की, व्रत रखा और संतान की रक्षा के लिए प्रार्थना की। उसकी सच्ची श्रद्धा और पश्चाताप से प्रसन्न होकर हरछठ माता ने उसके बच्चे को जीवनदान दिया। तभी से माताओं में यह मान्यता प्रचलित हुई कि हलषष्ठी व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से संतान पर आने वाले हर संकट दूर होते हैं। एक अन्य लोकमान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय उनकी माता देवकी के छह पुत्रों का कंस ने वध कर दिया था। भगवान बलराम जी का अवतार भी देवकी के गर्भ से हुआ था, लेकिन योगमाया ने उन्हें रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। इसी कारण बलराम जी को संकर्षण भी कहा जाता है। भगवान बलराम का जन्म षष्ठी तिथि से जुड़ा होने के कारण इस दिन माताएं उनकी पूजा कर संतान की रक्षा और मंगल की कामना करती हैं।
परंपरा के साथ हुआ पूजन
हलषष्ठी व्रत के अवसर पर महिलाओं ने घरों एवं पूजा स्थलों पर हरछठ माता की पूजा की। पूजा के दौरान महिलाओं ने कथा सुनी और आरती कर प्रसाद चढ़ाया। बिर्रा सहित अंचल के कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना कर एक-दूसरे को व्रत की शुभकामनाएं दीं।
मान्यता है कि इस दिन माताएं विशेष नियमों का पालन करती हैं और खेत में हल से जुड़ी उपज तथा सामान्य रूप से हल चलाकर पैदा किए गए अन्न का सेवन नहीं करतीं। पूजन में स्थानीय परंपरा के अनुसार महुआ, पलाश, कुशा, छह प्रकार के अनाज तथा अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है। क्षेत्र के अनुसार पूजा की विधि और कथा में कुछ स्थानीय अंतर भी देखने को मिलता है। महिलाओं ने कहा कि हलषष्ठी व्रत हमारी धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकसंस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली से भी जुड़ा हुआ है। यह पर्व मातृत्व की भावना और संतान के प्रति मां के समर्पण को दर्शाता है। पूजा-अर्चना और कथा श्रवण के बाद महिलाओं ने परिवार में सुख-शांति तथा संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। मल्दा में पूरे दिन व्रत को लेकर श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना रहा।
इस अवसर पर श्रीमती लक्ष्मीनबाई, श्रीमती कांति कश्यप, श्रीमती पार्वती कश्यप , श्रीमती लक्ष्मी मित्तल, श्रीमती अनीता कश्यप , श्रीमती यशोदा, श्रीमती सत्या गुप्ता और किरीतराम कश्यप आदि के अलावा बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित थी।
