पति पत्नी और वह, जहां वह अपराधी तो नहीं, पर तलाक की वजह होने से क्षति पूर्ति का जवाबदार दिल्ली उच्च न्यायालय


सक्ती – दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक पत्नी के द्वारा पति के प्रेमिका के खिलाफ दर्ज मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र कौरव ने कहा कि यद्यपि उच्चतम न्यायालय के २०१८ के निर्णय के बाद से व्यभिचार अपराध नहीं है पर पीड़ित पक्ष के लिए इसका परिणाम खतरनाक हो सकता है फलस्वरूप वह पीड़ित पक्ष को क्षतिपूर्ति देने के लिए जवाबदार है। न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र कौरव का यह निर्णय एडल्टरी (व्यभिचार) के खिलाफ भविष्य के लिए एक नजीर है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के २०१८ फैसले के बाद तेज गति से समाज में व्यभिचार के मामले बढ़ रहे हैं और पत्नियां अपने प्रेमी के साथ भागकर शादी रचाने लगी हैं जिससे शादी जैसी पवित्र बंधन कलंकित हो रहा है। खासकर बाल बच्चों वाली पत्नियां भी अपने पुराने आशिक के साथ व्यभिचार में शामिल होकर पूर्व पतियों से अलग होने को तत्पर हैं तथा कभी कभी पति की हत्या जैसी खतरनाक घटनाएं समाज में घटित हो रही हैं।
इन परिस्थितियों दिल्ली उच्च न्यायालय के १५ सितंबर २०२५ के इस निर्णय का बिगड़ती भारतीय संस्कृति एवं पारिवारिक व्यवस्था के खिलाफ एक सकारात्मक प्रभाव दिखाई देगा। दिल्ली उच्च न्यायालय का वर्तमान मामला एक पत्नी का अपने पति की प्रेमिका के खिलाफ है जिसमें पति पत्नी का विवाह २०१२ में हुआ था जिनके २०१८ दो जुड़वा बच्चे हुए पर समस्या तब शुरू हुई जब पति_पत्नी के रिश्ते के बीच वह के रूप में पति की व्यावसायिक साथी याने प्रेमिका का दखल शुरू हुआ और पति पत्नी के बीच तलाक की नौबत आ गई और पति ने परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी लगाई जिसके बाद पत्नी ने दिल्ली हाइ कोर्ट का रुख किया जहां पति और प्रेमिका ने तर्क दिया कि पारिवारिक मामलों की सुनवाई परिवार न्यायालय में होनी चाहिए। तब दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति की पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए बताया कि यद्यपि सुप्रीम कोर्ट के २०१८ के फैसले ने व्यभिचार को अपराध नहीं माना पर व्यभिचार का लाइसेंस भी नहीं दिया है फलस्वरूप व्यभिचार के कारण टूटते स्थिति हुए क्षतिपूर्ति का मामला सिविल प्रकृति का है जिसके लिए परिवार न्यायालय के बजाय सिविल न्यायालय में सुनवाई संभव है फलस्वरूप यह निर्णय एलिनेशन ऑफ अफेक्शन सिद्धांत की दृष्टि से एक नजीर साबित हो सकता है जिसके अनुसार शादी विवाह जैसे पवित्र सामाजिक रिश्ते में प्यार और विश्वास को जानबुझ कर तोड़ने वाले व्यक्ति से पीड़ित को कानूनी रूप से जवाबदार मानकर हर्जाना दिलाया जाना चाहिए क्योंकि निजी स्वतंत्रता अपराध नहीं है परन्तु शादी संबंधों की पवित्रता की भी अपनी मर्यादाएं है।
इस संबध में यह भी उल्लेखनीय है सुप्रीम कोर्ट के २०१८ के फैसले के पूर्व विवाहेत्तर संबध एडल्टरी (व्यभिचार) ४९७ भारतीय दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध थी पर अब वैयक्तिक स्वतंत्रता के नाम पर बढ़ते चारित्रिक पतन की भयावह स्थिति को लेकर चिंतन शुरू हो गई हैं तथा भारतीय न्याय संहिता निर्माण के दरमियान संसदीय समिति ने पुनः व्यभिचार को जेंडर न्यूट्रल याने लिंग विहीन अपराध सूची में शामिल करने की सिफारिश किया है तथा इस अपराध के लिए महिला पुरुष दोनों को समान रूप से दोषी ठहराया जावे। अगर संसदीय समिति की सिफारिश स्वीकार कर ली गई तो यह सुप्रीम कोर्ट के ५ सदस्यीय पीठ के २०१८ के व्यभिचार को अनुमति देने वाले निर्णय के सर्वथा खिलाफ होगी। इस संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग लीगल सेल के प्रदेश अध्यक्ष एवं उच्च न्यायालय अधिवक्ता चितरंजय पटेल ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय के व्यभिचार से संबंधित हालिया निर्णय से एक नई आस जगी है कि व्यभिचार को पुनः अपराध की श्रेणी में लाने से यह भारतीय संस्कृति एवं पारिवारिक व्यवस्था के अनुरूप विवाह जैसी पवित्र रिश्तों के पुनर्स्थापन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।


