NHRSJC ने महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती पर दी श्रद्धांजलि…

सामाजिक न्याय, समरसता और शिक्षा के प्रणेता ज्योतिबा फुले…
सक्ती । भारतीय इतिहास में सामाजिक न्याय, समरसता और शिक्षा के प्रणेता महात्मा ज्योतिबा फुले ने आजीवन जातिगत भेद भाव के खिलाफ संघर्ष करते हुए सामाजिक बुराइयों एवं कुरीतियों को दूर करने शिक्षा को एकमात्र माध्यम बताते हुए नारी शिक्षा पर बल दिया तथा अपने धर्मपत्नी व देश की प्रथम महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे में सर्वप्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना करते हुए बालिका शिक्षा का शुभारंभ किया, यह बात राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग लीगल सेल के प्रदेश अध्यक्ष एवं उच्च न्यायालय अधिवक्ता चितरंजय पटेल ने महात्मा ज्योतिबा फुले की जन्म जयंती (11 अप्रैल 1827) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र प्रांत के महान समाज सुधारक, विचारक और क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे, जिन्होंने नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और दलित व पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया।
ज्योतिबा माली समाज से होने से उनका परिवार सब्जियों की खेती करता था। उन्होंने 24 सितंबर 1873 को दलितों और शूद्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए ‘सत्य शोधक समाज’ का गठन किया। साथ ही हमेशा जाति व्यवस्था, छुआछूत और अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष करते रहे तो वहीं उन्होंने विधवाओं की दयनीय स्थिति देखकर उनके पुनर्विवाह का समर्थन किया। उनके संघर्ष और सेवा कार्यों को देखते हुए 1888 में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई। महात्मा ज्योतिबा फुले का मानना था कि सामाजिक बुराइयों से लड़ने का एकमात्र साधन शिक्षा है।
आज सामाजिक न्याय और समरसता की बात हर मंच पर गूंजती है पर वर्षों पूर्व इस आवाज को बुलंद करने वाले ज्योतिबा फुले को चंद लोग ही जानते है जबकि बाबा साहब अंबेडकर ने स्वयं ज्योतिबा फुले के आदर्शों को आत्मसात कर संविधान में सामाजिक न्याय की बात को समाहित किया था आज NHRSJC ने ज्योतिबा के जन्म जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का आग्रह किया।


