राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष: ‘आओ बनाएँ समर्थ भारत’ के संकल्प के साथ शताब्दी वर्ष का आगाज़

सक्ती – विजयादशमी 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक संगठन के क्षेत्र में 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन चुके संघ की शताब्दी वर्ष यात्रा समाज में व्यापक जिज्ञासा और प्रेरणा का विषय बनी हुई है।
संघ स्थापना: एक राष्ट्रदृष्टि का प्रारंभ
डॉक्टर हेडगेवार जन्मजात देशभक्त और स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी कार्यकर्ता थे। दो बार जेल का सामना करने के बाद उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत को स्वतंत्रता और परम् वैभव दिलाने का मार्ग केवल संगठित हिन्दू समाज में ही निहित है। जाति, भाषा, वेश, प्रदेश जैसी विविधताओं को दूर कर एकात्म जीवनदृष्टि के आधार पर हिन्दू समाज को संगठित करने के संकल्प से ही संघ की स्थापना की गई।
शाखा: चरित्र निर्माण की अनोखी कार्यपद्धति
नागपुर के मोहिते बाड़ा में प्रारंभ हुई प्रथम शाखा से लेकर आज तक संघ का मूल आधार व्यक्ति निर्माण ही रहा है। दैनिक शाखा में साधारण खेल, योग, व्यायाम, गीत, कथा, प्रार्थना आदि के माध्यम से स्वयंसेवकों में साहस, अनुशासन, सेवा, देशभक्ति और चरित्र का निर्माण किया जाता है। इसी कार्यपद्धति ने सामान्य व्यक्तियों को असाधारण नेतृत्वकर्ता और समाजसेवी बनाया है।
देशव्यापी विस्तार: 98.3% जिलों तक पहुँच
उपेक्षा और विरोध से लेकर जनस्वीकार्यता तक के सफर में संघ ने समाज का भरोसा जीता है। आज संघ का कार्य 924 में से 98.3% जिलों, 6618 में से 92.3% खण्डों, 58939 में से 52.2% मण्डलों तक पहुँच चुका है। देशभर में 51740 स्थानों पर 83129 दैनिक शाखाएँ तथा 32147 साप्ताहिक मिलन नियमित रूप से संचालित हो रहे हैं। 129000 सेवा कार्य: हर आपदा व आवश्यकता में अग्रिम पंक्ति में स्वयंसेवक
स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार, ग्राम-विकास, गौसंवर्धन तथा स्वावलंबन जैसे विविध क्षेत्रों में संघ और समाज के सहयोग से 1.29 लाख सेवा गतिविधियाँ चल रही हैं। आपदा हो या संकट स्वयंसेवक सदैव तत्पर रहते हैं।
शताब्दी वर्ष के पाँच संकल्प: पंच परिवर्तन
देशव्यापी जन-जागरण के लिए संघ ने शताब्दी वर्ष में पाँच प्रमुख विषयों पर विशेष अभियान प्रारंभ किए हैं
1. सामाजिक समरसता
2. पर्यावरण संरक्षण
3. कुटुम्ब प्रबोधन
4. स्व आधारित जीवन
5. नागरिक कर्तव्यबोध
इन अभियानों का लक्ष्य समाज को एकात्म, स्वावलंबी,पर्यावरण सचेत और कर्तव्यनिष्ठ बनाना है।
राष्ट्रनिर्माण का आह्वान
संघ ने कहा है कि भारत विशाल है, इसलिए स्थायी सामाजिक परिवर्तन सभी सज्जन शक्तियों के संयुक्त प्रयास से ही संभव है। मतभेदों को भुलाकर एकजुट होकर कार्य करने का समय आ चुका है। शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ का आह्वान है “आइए, हम सभी मिलकर भारत माता को परम् वैभव तक पहुँचाने में अपना योगदान दें।


