भागवत की कथा से हृदय में भक्ति का उदय होता है और जीवन की व्यथा दूर होती है – भागवताचार्य राजेंद्र जी महाराज


बिर्रा । भागवत की नियति ब्रह्म मय होना है , भगवत परायण बनाना है , भागवत की कथा से हृदय में भक्ति का उदय होता है और जीवन की व्यथा दूर होती है। निराकार ब्रह्म को कथा के माध्यम से हम साकार रूप में समझ पाते हैं । सनातन में वैदिक और पौराणिक काल से कथा की प्राचीन परंपरा है , यह उद्गार बिर्रा में कर्ष परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन व्यास पीठ से प्रसिद्ध कथा वाचक आचार्य राजेंद्र जी महाराज जी ने प्रकट किया।
आचार्य ने बताया की भागवत भगवान के अवतारों का इतिहास है । मनुष्य को अपने भावी जन्म की तैयारी इसी जन्म में ही करना पड़ता है , राजा परीक्षित को श्रृंगी ऋषि ने श्राप दिया की सात में दिन तक नाग के डसने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी । तब राजा परीक्षित के जीवन में सद्गुरु बनकर शुकदेव जी महाराज का आगमन हुआ और उन्होंने बताया कि दो घड़ी का सत्संग ही मनुष्य के सद्गति का कारण बनता है । अभी तो तुम्हारे जीवन में 7 दिन बाकी है
इसलिए सत्संग करो क्योंकि सत्संग ही भगवत प्राप्ति की पहली सीढ़ी है ।
इस संसार में पहली बार श्रीमद् भागवत की कथा शुकदेव जी महाराज के मुख से प्रवाहित हुई जिसे राजा परीक्षित ने श्रवण किया । आचार्य द्वारा सृष्टि वर्णन दिती कश्यप संवाद एवं ध्रुव चरित्र की कथा का विस्तार से वर्णन किया गया । आचार्य ने बताया कि माता सुनीति ने अपने 5 वर्ष के पुत्र को भगवान की तपस्या अर्थात उसके हृदय में अध्यात्म और भक्ति का रोपण किया । दिव्या संस्कारों का आधान किया । माता ही अपने संतान की प्रथम गुरु होती है । बेटे और बेटियां देने का काम तो भगवान करते हैं किंतु उन्हें योग्य और दक्षता प्रदान करना माता-पिता का ही कार्य है । माता सुनीति की प्रेरणा से ध्रुव जी ने भगवान को अपने भक्ति के बल पर सातवें आसमान से नीचे उतरा था । भगवान हमेशा अपने भक्त के वशीभूत हो जाते हैं । भक्ति की डोर से ही भगवान को बांधा जा सकता है ।
ध्रुव जी ने संकल्प किया था देहम वा पात वामी , कार्यम वा साध यामी अर्थात या तो अपने कार्य को सिद्ध करूंगा या फिर अपना देह ही त्याग दूंगा । दृढ़ संकल्प करने पर हमारा कठिन से कठिन कार्य भी सिद्ध हो जाता है । भगवान की भक्ति के बल पर ध्रुव जी को ध्रुव लोक की प्राप्ति हुई ।
इस प्रसंग में यदि उसे दिन माता सुनीति छोटी महारानी सुरुचि से यह कह दी होती कि मेरे लाडले बेटे को तपस्या के लिए भेजने वाली तुम कौन होती हो बड़ी महारानी मैं हूं और मेरा बेटा ही इस राज्य का उत्तराधिकारी होगा। तो आज ध्रुव चरित्र की कथा श्रीमद् भागवत महापुराण में नहीं होती।
श्रीमद् भागवत महापुराण में श्री कृष्ण चरित्र का विस्तार होने के बाद भी इसे अन्य पुराणों की तरह श्री कृष्ण पुराण नहीं कहा बल्कि इसे श्रीमद् भागवत महापुराण कहा वह इसलिए के इस महापुराण में केवल भगवान की ही नहीं बल्कि उनके प्रिय भक्तों की कथा का विस्तार किया गया है ।
कथा श्रवण करने हेतु स्रोतों की भीड़ उमड़ रही है, आयोजक कर्ष परिवार द्वारा कथा श्रवण का पुण्य लाभ प्राप्त करने अधिक से अधिक संख्या में आने की अपील की गई है ।


